– अनुभवी कर्मचारी किनारे, पिछड़ता जा रहा जिला
फर्रुखाबाद। कई सरकारी विभागों में इन दिनों पटलों पर कर्मचारियों की तैनाती को लेकर अंदरखाने असंतोष देखने को मिल रहा है। आरोप हैं कि महत्वपूर्ण सीटों और संवेदनशील कार्यों पर नियम, वरिष्ठता और अनुभव को दरकिनार कर पूर्व में माफिया तंत्र की सेटिंग से मनचाहे ढंग से कर्मचारियों की तैनाती की गईं थी, ताकि जिला हर रैंकिंग में पिछड़ता दिखे और अधिकारी उसके जिम्मेदार हों । इससे न केवल विभागीय कार्यप्रणाली प्रभावित हुईं , बल्कि अधिकारी भी भ्रमित स्थिति में दिखाई रहे, और कुछ बेईमान घूसखोर अपनी मनमानी करते रहे।
सूत्रों के अनुसार कई विभागों में “जेम बाबू” व्यवस्था के नाम पर कनिष्ठ कर्मचारियों को ऐसे महत्वपूर्ण पटल सौंप दिए गए हैं, जहां अनुभव और प्रशासनिक समझ की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। वहीं वर्षों से कार्य कर रहे अनुभवी और मानक के अनुरूप कर्मचारियों को कम महत्व वाली सीटों पर बैठा दिया गया है। इससे विभागीय संतुलन बिगड़ने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। प्रमुख विभाग जैसे शिक्षा स्वास्थ्य में तो हद ही हो गई और उन सब को नेतृत्व के लिए ऊपर भी गैर जिम्मेदारों को मलाई की सीटें मिलीं लेकिन रिमोट कहीं और रहा।
कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि कुछ विभागों में “पसंदीदा तैनाती” का नया सिस्टम चला , जिसमें कार्यकुशलता से ज्यादा व्यक्तिगत समीकरणों को महत्व दिया जा रहा है। परिणाम यह हुआ कि कई मामलों में परिपक्व और अनुभवी कर्मचारियों की सलाह को नजरअंदाज कर दिया जाता रहा हो उन्होंने भी चुप्पी साधना ही मुनासिब समझा , जबकि कम अनुभव वाले कर्मचारी महत्वपूर्ण फाइलों और निर्णय प्रक्रिया को संभालते दिखे, जिसका नतीजा जिला कई मामलों में फिसड्डी रहा।
इस स्थिति का असर प्रशासनिक कार्यों पर भी दिखाई देने लगा है। कई अधिकारी अंदरखाने यह स्वीकारते भी हैं कि गलत पटल व्यवस्था के कारण फाइलों में देरी, तकनीकी त्रुटियां और निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति पैदा रहे । कुछ मामलों में शासन स्तर तक जाने वाली सूचनाओं और रिपोर्टों में भी समन्वय की कमी सामने आयीं ।
कुछ अनुभवी कर्मचारियों का कहना है कि किसी भी विभाग की रीढ़ उसकी अनुभवी कार्यशैली और व्यवस्थित पटल प्रणाली होती है। यदि वरिष्ठता, अनुभव और दक्षता को नजरअंदाज कर केवल “मनमानी तैनाती” की जाएगी, तो इसका सीधा असर जनहित से जुड़े कार्यों पर पड़ेगा।
सूत्र बताते हैं कि कुछ विभागों में लंबे समय से एक ही कर्मचारियों का प्रभाव बना हुआ है और वही तय करते हैं कि किसे कौन-सी सीट मिलेगी। भले ही बह उस दफ्तर से हट गए हो लेकिन उनका दखल आज भी पटल के मुताबिक ही रहता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञ मानते हैं कि संवेदनशील और तकनीकी कार्यों वाले पटलों पर प्रशिक्षित एवं अनुभवी कर्मचारियों की तैनाती जरूरी होती है। यदि केवल व्यक्तिगत पसंद के आधार पर सीटें बांटी जाएंगी तो शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन और विभागीय गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ना तय है।
हालांकि बदली व्यवस्था में कुछ सुधार के प्रयास दिखने शुरू हुए हैं परिणाम आने के बाद पता चलेगा कि प्रशासन इस बढ़ते असंतोष और मनमानी तैनाती के आरोपों को गंभीरता से लेता है या फिर विभागों में “पसंदीदा पटल” की व्यवस्था इसी तरह चलती रहेगी।


