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Tuesday, June 30, 2026

महिला और पुरुष चालकों का ड्राइविंग स्कोर लगभग एक समान रहा: ज़ूनो इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026

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भारत में ड्राइविंग के लिए सबसे जोखिम भरा समय रात 9 से 10 बजे के बीच है

नई दिल्ली: नए ज़माने की डिजिटल बीमा कंपनी ज़ूनो जनरल इंश्योरेंस ने ‘इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट (आईआरएसआर) 2026’ जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, रात 9 बजे से 10 बजे के बीच का समय भारत में ड्राइविंग के लिए सबसे जोखिम भरा घंटा है। इस दौरान औसत ड्राइविंग स्कोर 86 दर्ज किया गया, जबकि दोपहर 1 बजे से 2 बजे के बीच का समय दिन का सबसे सुरक्षित घंटा रहा, जहां ड्राइविंग स्कोर 93 पाया गया।

यह रिपोर्ट ज़ूनो स्मार्टड्राइव ऐप का इस्तेमाल करने वाले 17 राज्यों के 27 हजार से अधिक सक्रिय यूज़र्स के डेटा पर आधारित है। इसके लिए 45 लाख से अधिक यात्राओं और 5.5 करोड़ किलोमीटर से ज़्यादा के ड्राइविंग व्यवहार का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि किसी व्यक्ति की जनसांख्यिकीय विशेषताओं (जैसे उम्र या जेंडर) की तुलना में उसके ड्राइविंग का पैटर्न सड़क के जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है। ये आंकड़े भारत भर में सड़क सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए लोगों की ड्राइविंग आदतों में बदलाव लाने वाले ठोस प्रयासों की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं।

इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026 के मुख्य निष्कर्ष:

• महिला बनाम पुरुष ड्राइविंग: महिलाओं ने औसतन 92.86 का ड्राइविंग स्कोर दर्ज किया, जबकि पुरुषों का स्कोर 92.43 रहा। यह दर्शाता है कि दोनों के कुल ड्राइविंग व्यवहार में न के बराबर अंतर है।
• समय के अनुसार स्कोर: दिन के अधिकांश समय ड्राइविंग स्कोर स्थिर रहता है, लेकिन रात 8 बजे के बाद इसमें भारी गिरावट आती है।
• सबसे सुरक्षित और जोखिम भरा समय: रात 9 बजे से 10 बजे के बीच का समय सबसे जोखिम भरा (स्कोर: 86) है, जबकि दोपहर 1 बजे से 2 बजे का समय सबसे सुरक्षित (स्कोर: 93) है।
• कमज़ोर ड्राइविंग आदतें: भारतीय वाहन चालकों में अचानक ब्रेक लगाना (स्कोर: 87) और तेज़ी से एक्सीलेटर दबाना/रफ़्तार बढ़ाना (स्कोर: 91) सबसे कमज़ोर व्यावहारिक पैरामीटर के रूप में सामने आए हैं।
• मौसम का प्रभाव: ड्राइविंग व्यवहार पर मौसमी परिस्थितियों का बहुत सीमित प्रभाव देखा गया। गर्मी, बारिश और सर्दी के महीनों में औसत ड्राइविंग स्कोर काफी हद तक एक समान बना रहा।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में 80% से अधिक मामलों के लिए व्यावहारिक कारक ज़िम्मेदार हैं। यह आंकड़ा जागरूकता, नियमों के सख्त पालन और तकनीक-आधारित उपायों के ज़रिए तेज़ रफ़्तार, ध्यान भटकने और असुरक्षित तरीके से वाहन मोड़ने या चलाने जैसी समस्याओं को ठीक करने के महत्व को रेखांकित करता है।

रिपोर्ट के बारे में, ज़ूनो जनरल इंश्योरेंस की एमडी और सीईओ, शनाई घोष ने कहा, “सड़क सुरक्षा भारत की सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक चुनौतियों में से एक बनी हुई है, जो जीवन, आजीविका और आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित करती है। ‘ज़ूनो स्मार्टड्राइव’ के माध्यम से, हमें लाखों यात्राओं के दौरान ड्राइविंग व्यवहार को बेहद करीब से देखने का मौका मिला है, और एक बात साफ तौर पर सामने आती है: सड़क दुर्घटनाएं अक्सर ऐसे व्यावहारिक पैटर्न की वजह से होती हैं जिन्हें पहचाना और मापा जा सकता है।

‘इंडिया रोड सेफ्टी रिपोर्ट 2026’ यह दर्शाती है कि कैसे डेटा, ड्राइविंग पैटर्न और टेक्‍नोलॉजी, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून के पालन और वाहन सुरक्षा उपायों के साथ मिलकर सुरक्षित सड़कें बनाने में और ज़्यादा कारगर हो सकती है। जैसे-जैसे भारत अपने सड़क सुरक्षा लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, ड्राइविंग व्यवहार के प्रति अधिक जागरूकता पैदा करना और सुरक्षित आदतों को बढ़ावा देना, मौतों को कम करने और बेहतर परिणाम हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।”

भारत में हर साल लगभग 1.73 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं, जो वैश्विक स्तर पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का लगभग 11% है। सड़क दुर्घटनाओं के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर जीडीपी के 3 से 5% के बराबर आर्थिक बोझ पड़ता है। दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों में से लगभग दो-तिहाई लोग 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं।

कुल मौतों में 44% हिस्सेदारी दोपहिया वाहन चालकों की है, जबकि लगभग 19% मौतें पैदल चलने वालों की होती हैं, जो सड़क पर सबसे असुरक्षित लोगों पर पड़ने वाले अत्यधिक प्रभाव को दिखाता है।

अब जब भारत स्टॉकहोम घोषणापत्र के तहत 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को 50% तक कम करने की अपनी प्रतिबद्धता की दिशा में काम कर रहा है, यह रिपोर्ट बुनियादी ढांचे, प्रवर्तन और व्यवहार संबंधी हस्तक्षेपों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

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