(विवेकानंद-विनायक फीचर्स)
एक और पेपर लीक, एक और परीक्षा रद्द। महाराष्ट्र में टीईटी का पेपर ऐसे समय लीक हुआ जब नीट-यूजी पेपर लीक को लेकर सख्त कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं। व्यापमं घोटाले से यदि सबक लिया होता तो शायद बच्चों के भविष्य के साथ यूं खिलवाड़ नहीं देखना पड़ता।
यह गजब संयोग है कि जनता को बांधे रखने के लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक एजेंडे में जो तीन कोर मुद्दे रखे हैं, इस वक्त तीनों ही चुनौती बने हुए हैं। परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं, युवा वर्ग में निराशा है। रामलला के मंदिर से चढ़ावा चोरी हो गया, श्रद्धालुओं में गुस्सा है। साल भर से अधिक समय बीत जाने के बाद ऑपरेशन सिंदूर में छह जवानों की शहादत स्वीकार की गई। इसे लेकर भी सवाल हैं।
29 जुलाई 2025 को लोकसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किसी भी भारतीय सैनिक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। जब शहीद जवानों के नाम सार्वजनिक हुए तब सवाल उठे। इसके बाद सरकार की ओर से 27 जून 2026 को जवाब आया कि रक्षा मंत्री के बयान को चुनिंदा रूप से उद्धृत किया गया है और उसके संदर्भ को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
रक्षा मंत्रालय की सफाई के बाद यह समझना मुश्किल हो रहा है कि क्या युद्ध में पायलट और जवान को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है? क्या पायलट के अलावा किसी जवान का शहीद होना नुकसान की श्रेणी में नहीं आता?
बहरहाल! आरोपों और असहमतियों को स्वीकार न करना राजनीति की पुरानी अदा है। बीजेपी ने इस अदा का सबसे उम्दा प्रदर्शन किया है। लेकिन इस बार मामला ‘नीम चढ़े करेले’ जैसा है। दरअसल उत्तर प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं और ऐसे समय में रामधन की चोरी का मामला बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे को जख्मी कर सकता है। यह चिंता बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से लेकर कार्यकर्ताओं तक दिखाई दे रही है। लिहाजा पीएमओ से लेकर आरएसएस प्रमुख तक मौन किंतु सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। पीएमओ रिपोर्ट मांग चुका है, आरएसएस प्रमुख के पास भी एक रिपोर्ट पहुंचने की खबर है। दावा किया जा रहा है कि चंपत राय का इस्तीफा भी संघ और केंद्र सरकार के दबाव में हुआ है।
बीजेपी की उलझन रामलला के चढ़ावे की चोरी नहीं है, असल उलझन यह है कि कोई सिर ऐसा नहीं जिस पर इल्जाम थोपकर बरी हो लिया जाए। सभी सिर अपने हैं। राम मंदिर ट्रस्ट में विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस के पदाधिकारी और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त लोग हैं। इन्हीं लोगों ने अन्य सेवादारों की नियुक्ति की है। इनमें भी कोई न कोई किसी न किसी का करीबी है। इसके अलावा मंदिर निर्माण के पहले से ही अयोध्या में जमीनों की संदिग्ध खरीद-फरोख्त की खबरें आती रही हैं। हालांकि इनमें करप्शन के आरोपों को खारिज किया जाता रहा है, लेकिन रामधन की चोरी के बाद उधड़ी परतों के साथ ये भी बेपर्दा होते नजर आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने जमीनों की घपलेबाजी के सबूत देने का दावा किया है। खबर यह भी है कि चढ़ावे में चोरी का एक आरोपी अयोध्या के वीआईपी क्षेत्र में आलीशान घर बनवा रहा है। मंदिर से उसे सिर्फ 12 हजार रुपए सैलरी मिलती है। हालांकि यह संभव है कि उसके पास घर बनवाने लायक पैसा पहले से हो। लेकिन बीजेपी इस मसले को भी अन्य आरोपों की तरह साधने की कोशिश कर रही है।
पेपर चोरी पर सवाल उठाने वालों को टुकड़े-टुकड़े गैंग कह कर प्रचारित किया जा रहा है और रामलला के चढ़ावे की चोरी पर सवाल उठाने वालों को रामद्रोही साबित करने वाले बयान दिए जा रहे हैं। मामूली चोर-उचक्कों को रिमांड पर लेने वाली पुलिस बेहद संयमित है। पुलिस ने आठ आरोपियों को दो बार कोर्ट में पेश किया, एक भी बार रिमांड नहीं मांगी। चंपत राय ने ट्रस्ट से इस्तीफा दिया है, पर अभी तक उसे मंजूर नहीं किया गया है।
इस बचाव का राजनीतिक असर क्या और कैसा होगा, यह कहना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। क्योंकि व्यापमं से लेकर राफेल और फिर वोट चोरी तक के आरोप न केवल सरकार और बीजेपी खारिज करती आई है, बल्कि वोट के रूप में जनता ने भी इन्हें नकार दिया है। बीजेपी को उम्मीद रहेगी कि अन्य आरोपों की तरह रामधन की चोरी भी जनता नकार देगी। इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता राम मंदिर आंदोलन के वक्त हुए गोलीकांड और बाबर का वंशज जैसे बयानों को धार दे रहे हैं।
बीजेपी की उम्मीद से कोई हैरानी नहीं है, लेकिन जनता के मन में कुछ सवाल तो हैं ही। मसलन, क्या राम के अस्तित्व को नकारना चढ़ावे में चोरी होने देने का लाइसेंस है? अगर सवाल उठाने वाले बाबर की औलाद हैं तो जिन्होंने चोरी की है वे किसकी औलाद हैं? सनातन की बदनामी चोरी उजागर करने में है या चोरी होते रहने देने में है? जिस जोश के साथ राम मंदिर बनाने के लिए खुद की पीठ ठोकते हैं, उतने ही साहस से मंदिर में हुए गबन को न रोक पाने की जिम्मेदारी क्यों नहीं ली जा रही? ये कोई मंत्रालय नहीं है, इसकी गड़बड़ियों को नजरअंदाज करना थोड़ा मुश्किल है। सवाल यह भी है… यदि चुनाव न होते तो क्या यह मुद्दा भी बाकियों की तरह खारिज कर दिया जाता? (विनायक फीचर्स)


