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Tuesday, May 12, 2026

सीएमओ कार्यालय में ‘चार्ज युद्ध’! झोलाछाप कार्रवाई का प्रभार हटते ही भड़के अपर सीएमओ, फिर शुरू हुआ दबाव का खेल

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फर्रुखाबाद। स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों अंदरखाने जबरदस्त खींचतान चल रही है। झोलाछाप डॉक्टरों और अवैध क्लीनिकों पर कार्रवाई से जुड़े अहम प्रभार को हटाए जाने के बाद अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रंजन गौतम और सीएमओ डॉ. अवनीन्द्र कुमार के बीच टकराव खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, प्रभार छीने जाने से नाराज डॉ. गौतम अब दोबारा वही जिम्मेदारी हासिल करने के लिए लगातार दबाव की राजनीति कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि बीते दिनों जनपद भ्रमण पर आए प्रभारी मंत्री के सामने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर कई शिकायतें पहुंची थीं। सूत्रों का दावा है कि झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई में ढिलाई, विभागीय समन्वय की कमी और प्रशासनिक विवादों को लेकर भी सवाल उठे थे। इसके बाद सीएमओ डॉ. अवनीन्द्र कुमार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए झोलाछाप और अवैध चिकित्सालयों पर कार्रवाई से जुड़ा प्रभार डॉ. रंजन गौतम से वापस लेकर दूसरे अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. माथुर को सौंप दिया।
यहीं से स्वास्थ्य विभाग के भीतर सत्ता संघर्ष की कहानी तेज हो गई। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि प्रभार हटने के बाद डॉ. गौतम बेहद नाराज हैं और लगातार पुराने अधिकार वापस पाने की कोशिशों में जुटे हैं। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि सीएमओ कार्यालय पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है ताकि कार्रवाई से जुड़ा चार्ज फिर से उन्हें सौंप दिया जाए।
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि जिस कार्रवाई को लेकर जनता को राहत मिलनी चाहिए थी, वही अब अफसरों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है। जिले में वर्षों से झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क सक्रिय है। गांवों से लेकर कस्बों तक बिना डिग्री इलाज करने वाले कथित डॉक्टर खुलेआम मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं, लेकिन विभागीय लड़ाई के चलते अभियान की धार कमजोर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
सूत्र बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग में यह मामला अब केवल प्रभार तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अफसरों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का रूप ले चुका है। यही वजह है कि विभागीय बैठकों से लेकर फाइलों तक में तनाव का असर दिखाई देने लगा है।
जब इस पूरे विवाद को लेकर सीएमओ डॉ. अवनीन्द्र कुमार से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने संक्षिप्त जवाब देते हुए कहा कि “वह कोर्ट में हैं।” हालांकि उन्होंने पूरे मामले पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग में प्रशासनिक फैसले जनहित में हो रहे हैं या फिर अफसरों के दबाव और लॉबिंग के आधार पर? अगर झोलाछापों पर कार्रवाई का जिम्मा भी अंदरूनी खींचतान की भेंट चढ़ गया तो इसका सीधा असर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था और आम मरीजों की सुरक्षा पर पड़ेगा।

अस्पतालों पर कार्रवाई के बाद ‘ऊपर’ से खुलवाने का दबाव, पहले से ही आहत हैं सीएमओ!

सूत्रों के मुताबिक जिले में झोलाछाप डॉक्टरों, अवैध क्लीनिकों और मानक विहीन तहसील स्तरीय अस्पतालों पर कार्रवाई के बाद कई बार स्वास्थ्य विभाग पर उन्हें दोबारा खुलवाने का दबाव बनाया जाता रहा है। बताया जाता है कि कार्रवाई के बाद सिफारिशों और फोन कॉल्स का सिलसिला शुरू हो जाता है, जिससे विभागीय अधिकारियों की कार्यवाही कमजोर पड़ जाती है।

अंदरखाने चर्चा है कि सीएमओ डॉ. अवनीन्द्र कुमार पहले से ही इस तरह के दबावों से परेशान और आहत चल रहे हैं। विभागीय सूत्रों का दावा है कि कई मामलों में सीलिंग और नोटिस की कार्रवाई के बाद भी अस्पताल दोबारा संचालित होने लगे, जिससे कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल उठे।

यही वजह मानी जा रही है कि हालिया प्रशासनिक फेरबदल को स्वास्थ्य विभाग के भीतर चल रही खींचतान और दबाव की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर झोलाछाप और अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई वास्तव में कितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष हो पा रही है?

लाभ के खेल में युवक को बना डाला ‘मानसिक रोगी’!
– पागलपन का लाइसेंस बना जिले में चर्चा का विषय

फर्रुखाबाद। सरकारी योजनाओं और लाभ दिलाने के नाम पर एक युवक को कथित तौर पर “मानसिक रोगी” घोषित कराने का मामला अब जिले में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग, प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक एक युवक का मानसिक विकलांगता प्रमाण पत्र ऐसे हालात में जारी किया गया, जबकि स्थानीय स्तर पर उसे सामान्य व्यवहार वाला बताया जा रहा है। और उसने इस लाइसेंस का इस्तेमाल कर कई जमीनों का खेल भी किया उसके ऊपर कई मुकदमे भी पूर्व से पंजीकृत हैं। आरोप है कि सरकारी लाभ, पेंशन और अन्य सुविधाओं का फायदा लेने के लिए कागजों में युवक को “पागल” साबित कर दिया गया।
जानकारों का कहना है कि मानसिक रोग या मानसिक दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने के लिए मेडिकल बोर्ड की जांच, मनोचिकित्सक की रिपोर्ट और कई स्तरों की प्रक्रिया जरूरी होती है। बावजूद इसके अगर किसी सामान्य युवक को लाभ के लिए मानसिक रोगी दिखाया गया है तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल है।
सूत्र बताते हैं कि मामले की भनक लगते ही विभागीय स्तर पर खलबली मच गई है। चर्चा यह भी है कि प्रमाण पत्र जारी कराने में कुछ बिचौलियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही। गांव में लोग तंज कसते नजर आ रहे हैं कि “सरकारी लाभ के लिए अब इंसान को कागजों में पागल भी बनाया जा सकता है।”
सबसे गंभीर बात यह है कि ऐसे मामलों से वास्तव में मानसिक रोग से पीड़ित और जरूरतमंद लोगों के अधिकार प्रभावित होते हैं। फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए योजनाओं का लाभ उठाने वाले लोग असली पात्रों का हक मार रहे हैं।

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