प्रशांत कटियार
भारत में आपराधिक न्याय व्यवस्था में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस ), 2023 लागू होने के बाद पुलिस जांच की प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। पुराने दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की जगह आई BNSS का उद्देश्य जांच को अधिक आधुनिक, तकनीक आधारित, समयबद्ध और नागरिक केंद्रित बनाना है। लेकिन असली सवाल यह है कि इन प्रावधानों का जमीन पर कितना पालन हो रहा है और क्या इससे विवेचना में वह पारदर्शिता आएगी जिसकी आम नागरिक लंबे समय से उम्मीद करता रहा है।
सबसे बड़ा बदलाव शिकायत दर्ज कराने के स्तर पर दिखाई देता है। बीएनएसएस की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध की सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है और जीरो एफआईआर की व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है। यानी अपराध किसी दूसरे थाना क्षेत्र में हुआ हो, तब भी सूचना देने वाले व्यक्ति को केवल अधिकार क्षेत्र के नाम पर वापस नहीं लौटाया जाना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी गई सूचना को औपचारिक रूप से दर्ज कराने के लिए तीन दिन के भीतर हस्ताक्षर की व्यवस्था भी है।
यह व्यवस्था कागज पर छोटी लग सकती है, लेकिन आम आदमी के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है। एफआईआर दर्ज कराने के लिए थाने के चक्कर, अधिकार क्षेत्र का विवाद और शिकायत को टालने की प्रवृत्ति—इन समस्याओं को तकनीक और जीरो एफआईआर काफी हद तक कम कर सकती।
बीएनएसएस में सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फॉरेंसिक विशेषज्ञ द्वारा घटनास्थल पर जाकर साक्ष्य जुटाने और प्रक्रिया की वीडियोग्राफी का प्रावधान किया गया है। साथ ही तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया को भी ऑडियो-वीडियो माध्यम से रिकॉर्ड करने की व्यवस्था है। पुलिस को तलाशी की रिकॉर्डिंग निर्धारित समय में मजिस्ट्रेट तक भेजनी होती है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में आपराधिक मामलों का बड़ा हिस्सा विवेचना की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यदि घटनास्थल की तस्वीरें, वीडियो, फिंगरप्रिंट, डीएनए, डिजिटल उपकरण और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य सही तरीके से सुरक्षित किए जाएं तो बाद में गवाहों के मुकरने या बयान बदलने की स्थिति में भी अभियोजन के पास मजबूत आधार रह सकता है।
आंकड़े बताते हैं कि चुनौती कितनी बड़ी है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार आईपीसी अपराधों में चार्जशीटिंग दर 72.7 प्रतिशत रही, जबकि जांच लंबित रहने की दर वर्ष के अंत में 29.2 प्रतिशत थी। मुकदमों में आईपीसी अपराधों की दोषसिद्धि दर 54 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह नहीं कि हर लंबित जांच पुलिस की गलती है या हर बरी होने का कारण कमजोर विवेचना है, लेकिन आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि एफआईआर से अदालत में दोषसिद्धि तक पहुंचने के बीच व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती मौजूद है।
धारा 193 के तहत पुलिस को 90 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता या पीड़ित को जांच की प्रगति की जानकारी देनी है। यह सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़े मामलों में पुलिस रिपोर्ट में उसके साक्ष्य की custody यानी किसके पास कब रहा, इसका क्रम दर्ज करने की व्यवस्था भी है। आगे की विवेचना के लिए अदालत की अनुमति से समय बढ़ाने की व्यवस्था भी की गई है।
यह प्रावधान उस पुराने सवाल का जवाब बनने की क्षमता रखता है जो अक्सर पीड़ित पूछता है“मेरी एफआईआर के बाद हुआ क्या?”
लेकिन केवल 90 दिन में सूचना देने का प्रावधान पर्याप्त नहीं है। सूचना ऐसी होनी चाहिए जिसे आम नागरिक समझ सके। सिर्फ यह लिख देना कि “विवेचना प्रचलित है” पारदर्शिता नहीं है। पीड़ित को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि जांच में कौन-कौन से महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, क्या साक्ष्य जुटाए गए और मामला किस चरण में है,बेशक ऐसी सीमा तक जहां जांच या गवाहों की सुरक्षा प्रभावित न हो।
यदि विवेचक पर राजनीतिक दबाव, स्थानीय प्रभाव, आर्थिक दबाव या विभागीय हस्तक्षेप रहेगा तो सबसे आधुनिक कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकता। एक निष्पक्ष विवेचक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह साक्ष्य के आधार पर आरोपी को बचाने या फंसाने के बजाय केवल तथ्य के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करे।
डिजिटल एफआईआर पारदर्शिता दे सकती है, कैमरा जांच का रिकॉर्ड बचा सकता है, फॉरेंसिक साक्ष्य विवेचना को वैज्ञानिक बना सकते हैं और 90 दिन की सूचना पीड़ित का भरोसा बढ़ा सकती है—लेकिन इन सबका संचालन अगर वही पुरानी अपारदर्शी कार्यशैली करेगी तो कानून का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव प्रारंभिक जांच से जुड़ा है। तीन से सात वर्ष तक की सजा वाले कुछ अपराधों में प्रारंभिक जांच का प्रावधान है, जिसे 14 दिनों में पूरा करने और कम से कम डीएसपी स्तर के अधिकारी की पूर्व अनुमति से करने की व्यवस्था बताई गई है। इसका उद्देश्य गंभीर मामलों में जल्दबाजी से बचना है, लेकिन यह प्रावधान शिकायत को अनिश्चितकाल तक रोकने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
इसी तरह महिलाओं के विरुद्ध कुछ गंभीर अपराधों की जांच को दो महीने के भीतर पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। न्यायिक प्रक्रिया के अन्य चरणों के लिए भी समयसीमाएं तय की गई हैं। केंद्र सरकार ने 2026 में बीएनएसएस की समयबद्ध व्यवस्थाओं में प्रारंभिक जांच 14 दिन, दस्तावेज उपलब्ध कराने 14 दिन, आगे की जांच 90 दिन और निर्णय के लिए 45 दिन जैसी समयसीमाओं को रेखांकित किया है।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। समयबद्ध जांच का अर्थ जल्दबाजी में की गई जांच नहीं होना चाहिए। किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से आरोपी बनाना जितना गंभीर है, उतना ही गंभीर है किसी वास्तविक अपराधी को कमजोर विवेचना के कारण कानून की पकड़ से बाहर निकल जाने देना।
इसलिए अब जरूरत है कि हर जिले में विवेचना की गुणवत्ता को मापने के लिए केवल एफआईआर और चार्जशीट की संख्या को सफलता का पैमाना न बनाया जाए। यह भी देखा जाए कि कितने मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाए गए, कितने मामलों में डिजिटल साक्ष्य की चैन ऑफ़ कस्टडी सही रही, कितने मामलों में पीड़ित को समय पर सूचना मिली और अदालत में कितने मामले मजबूत साक्ष्य के साथ टिके। कानून की धाराएं बदलने से न्याय व्यवस्था मजबूत नहीं होती; मजबूत होती है निष्पक्ष विवेचना से।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस थाने में एफआईआर से लेकर अदालत में चार्जशीट तक पूरी प्रक्रिया को अधिकतम संभव सीमा तक डिजिटल और ऑडिट योग्य बनाया जाए। विवेचक की प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्रवाई का रिकॉर्ड हो, वरिष्ठ अधिकारी उसकी समीक्षा करें और शिकायतकर्ता को कानून के दायरे में समय-समय पर जानकारी मिले।
नई व्यवस्था ने रास्ता जरूर खोला है। अब सरकारों और पुलिस नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि उस रास्ते पर चलने की व्यवस्था भी बनाए। आम आदमी को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें एफआईआर लिखवाने के लिए सिफारिश न लगे, विवेचना बदलवाने के लिए दबाव न चले, साक्ष्य गायब न हों, पीड़ित को महीनों अंधेरे में न रखा जाए और विवेचक किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में न आए।
कानून की पारदर्शिता तभी सार्थक होगी, जब विवेचना भी पारदर्शी, विवेचक निष्पक्ष और जांच एजेंसी जवाबदेह होगी। तभी “नागरिक सुरक्षा” केवल कानून का नाम नहीं, बल्कि आम आदमी का वास्तविक भरोसा बन सकेगी।**


