मौदहा, हमीरपुर
बुंदेलखंड की ऐतिहासिक पहचान रही चांदी की मछली की कारीगरी आज अस्तित्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। कभी देश-विदेश में अपनी बारीक शिल्पकला और चमक के लिए प्रसिद्ध यह कला अब बढ़ती लागत, घटती मांग और सरकारी सहयोग की कमी के चलते धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हमीरपुर जिले के मौदहा कस्बे के उपरौश मोहल्ले में रहने वाला सोनी परिवार किसी तरह इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहा है।
कारीगरों के अनुसार चांदी की मछली बनाने की प्रक्रिया बेहद सूक्ष्म और मेहनत भरी होती है। चांदी के तार को खींचकर पतली पट्टियों में बदला जाता है और फिर उन्हें पीट-पीटकर महीन जालीनुमा आकार दिया जाता है, जिससे मछली को लचीलापन और जीवंत रूप मिलता है। यह पूरी कारीगरी हाथ से की जाती है, जिसे मशीनों से दोहराना संभव नहीं है।
इस कला की जड़ें लगभग 400 वर्ष पुरानी मानी जाती हैं और इसे चंदेल काल से जोड़कर देखा जाता है। पारिवारिक इतिहास के अनुसार वर्ष 1738 में नवल सोनी के वंशजों ने इस कला को मूर्त रूप दिया था। तब से यह परिवार सात पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। इतिहासकारों के अनुसार यह कला मुगल और अंग्रेजी शासनकाल में भी प्रसिद्ध रही।
परिवार के दावों के अनुसार अंग्रेजी शासनकाल में चांदी की मछली को लंदन प्रदर्शनी में भी सराहा गया था, जहां इसकी बारीकी देखकर महारानी विक्टोरिया तक प्रभावित हुई थीं। बताया जाता है कि तुलसीदास सोनी को इस उपलब्धि पर सम्मान भी मिला था, जो आज भी परिवार के पास सुरक्षित है।
आज स्थिति यह है कि पहले जहां कई परिवार इस कारीगरी से जुड़े थे, वहीं अब केवल सोनी परिवार ही इसे संभाले हुए है। चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी और बाजार में मांग घटने से यह व्यवसाय लगातार घाटे में चल रहा है। कारीगरों के अनुसार पहले जहां बड़े ऑर्डर आते थे, अब स्थिति बहुत सीमित रह गई है।
परिवार के सदस्य बताते हैं कि महीने में करीब दो से ढाई लाख रुपये का कारोबार होता है, लेकिन शुद्ध बचत केवल 20 से 30 हजार रुपये तक ही रह जाती है। इसी कारण नई पीढ़ी इस काम से दूर होती जा रही है और परिवार के कई सदस्य अब दूसरे पेशों या नौकरी की ओर बढ़ चुके हैं।
स्थानीय बाजार में चांदी की मछली की कीमत उसके वजन और बारीकी के अनुसार तय होती है। 5 ग्राम की छोटी मछली लगभग 900 रुपये में मिलती है, जबकि 2 किलो तक की बड़ी मछली की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच जाती है। हालांकि यह उत्पाद मुख्य रूप से सीधे खरीदारों द्वारा ही खरीदा जाता है।
कारीगरों की सबसे बड़ी मांग है कि इस कला को GI टैग और ODOP योजना में शामिल किया जाए, ताकि इसे सरकारी संरक्षण मिल सके। साथ ही बिना ब्याज चांदी उपलब्ध कराने की भी मांग की जा रही है, जिससे उत्पादन लागत कम हो सके। उनका कहना है कि यदि सहयोग नहीं मिला तो यह अनोखी धरोहर केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।
फिलहाल जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की ओर से सहयोग का आश्वासन दिया गया है, लेकिन कारीगरों को उम्मीद है कि समय रहते ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि बुंदेलखंड की यह अनमोल कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।


