कोलकाता
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले मतुआ समुदाय एक बार फिर सियासी केंद्र में आ गया है। इसी को साधने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने शीर्ष नेतृत्व को मैदान में उतारते हुए बड़ा चुनावी दांव चला है। रविवार को उत्तर 24 परगना जिले के ठाकुरनगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहुंचकर मतुआ समुदाय को साधने की कोशिश की, जहां उन्होंने गुरु हरिचंद और गुरुचंद ठाकुर की ठाकुरबाड़ी में दर्शन-पूजन किया। इसे केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मतुआ अस्मिता और सामाजिक पहचान को संबोधित करने वाली रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
इसी के समानांतर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नदिया जिले के मतुआ बहुल क्षेत्रों—तेहट्ट और राणाघाट—में जनसभाएं कीं, जबकि बारासात में रोड शो कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। शीर्ष नेतृत्व की यह सक्रियता दर्शाती है कि भाजपा मतुआ वोट बैंक को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मतुआ और नामशूद्र समुदाय राज्य की करीब 30 से 40 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव रखते हैं, जबकि अन्य अनुसूचित जाति बहुल सीटों को मिलाकर यह आंकड़ा 70 से 80 तक पहुंच जाता है। यही वजह है कि बनगांव, राणाघाट, कृष्णानगर और बारासात जैसे इलाकों में चुनावी गतिविधियां तेज हो गई हैं।
हालांकि इस बार परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं मानी जा रहीं। मतदाता सूची से नाम कटने की शिकायतों और नागरिकता से जुड़े अधूरे वादों को लेकर समुदाय के भीतर कुछ असंतोष भी सामने आया है। ऐसे में भाजपा का यह अभियान केवल समर्थन जुटाने तक सीमित नहीं, बल्कि विश्वास बहाली और डैमेज कंट्रोल की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक योजनाओं के जरिए मतुआ समुदाय में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है। पांच साल पहले बांग्लादेश के ओराकांडी से दिया गया संदेश इस बार ठाकुरनगर की धरती से दोहराया गया है, लेकिन अब यह प्रतीकात्मक नहीं बल्कि सीधा और आक्रामक चुनावी दांव बन चुका है।


