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Friday, August 21, 2026

लोधी समाज के दिलों में आज भी जिंदा हैं बाबूजी कल्याण सिंह, इकाना में दिखी विरासत की ताकत

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– पांचवीं पुण्यतिथि पर ‘हिंदू गौरव दिवस’ में उमड़ा जनसमूह
– बेटे पूर्व मंत्री राजवीर सिंह ‘राजू भैया’ ने दिखाई राजनीतिक पकड़
– योगी समेत दिग्गजों ने बाबूजी के सिद्धांतों को याद किया

लखनऊ। पांच साल का वक्त गुजर गया, लेकिन बाबू कल्याण सिंह की स्मृतियां आज भी उनके समर्थकों के दिलों में उतनी ही जीवंत हैं। खासकर लोधी राजपूत समाज और पिछड़े वर्ग के बीच बाबूजी का नाम आज भी केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और सिद्धांतों की राजनीति के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है।

शुक्रवार को लखनऊ के भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम में उनकी पांचवीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘हिंदू गौरव दिवस’ ने इसी भाव को सामने ला दिया। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लोग बाबूजी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बाबूजी के पुत्र एवं पूर्व सांसद राजवीर सिंह ‘राजू भैया’, पौत्र एवं मंत्री संदीप सिंह, जे. पी. एस. राठौर, राकेश सचान, अरुण सक्सेना, धर्मपाल सिंह, सूर्य प्रताप शाही, असीम अरुण, दयाशंकर मिश्र, दयालु,कैलाश राजपूत,सांसद मुकेश राजपूत समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
कल्याण सिंह का राजनीतिक जीवन केवल सत्ता की कुर्सी तक सीमित नहीं रहा। साधारण किसान परिवार से निकलकर मुख्यमंत्री, सांसद और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों तक पहुंचने वाले बाबूजी ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पुण्यतिथि कार्यक्रम में बाबूजी के इसी व्यक्तित्व को याद किया। योगी ने कहा कि कल्याण सिंह कहा करते थे,‘कल्याण सिंह टूट सकता है, लेकिन झुक नहीं सकता।’ उन्होंने अपने जीवन में इस भावना को निभाया।
कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने वाले लोगों के लिए यह केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं था। अनेक समर्थकों के लिए यह उस नेता को याद करने का अवसर था, जिसने पिछड़े समाज के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व की नई भाषा गढ़ी।
कार्यक्रम में बाबूजी के पुत्र राजवीर सिंह ‘राजू भैया’ की मौजूदगी भी खास चर्चा का विषय रही। पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले राजवीर सिंह लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
इकाना में जुटे समर्थकों के बीच उनकी मौजूदगी ने यह संदेश जरूर दिया कि कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत केवल स्मृतियों में सीमित नहीं है, बल्कि उनका परिवार आज भी उस विरासत से जुड़े सामाजिक और राजनीतिक आधार को संभाले हुए है।
राजू भैया के लिए यह आयोजन भावनात्मक भी था। जिस पिता को उन्होंने सार्वजनिक जीवन में संघर्ष करते देखा, उसी पिता की पुण्यतिथि पर हजारों समर्थकों के बीच खड़े होकर श्रद्धांजलि देना उनके लिए व्यक्तिगत स्मृति का क्षण भी रहा।
कार्यक्रम में सांसद सच्चिदानंद हरि साक्षी महाराज समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने कल्याण सिंह के योगदान को याद किया। नेताओं ने कहा कि बाबूजी ने संगठन को मजबूत करने के साथ समाज के विभिन्न वर्गों को राजनीतिक मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्यक्रम में ‘बाबू कल्याण सिंह अमर रहें’ और ‘जय श्रीराम’ के नारे भी गूंजे। कल्याण सिंह को रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिनाते हुए वक्ताओं ने उनके योगदान को याद किया।
कल्याण सिंह की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष पिछड़ा वर्ग था। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े समाज की भागीदारी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि आज भी लोधी राजपूत समाज के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के एक बड़े हिस्से में उनके प्रति भावनात्मक जुड़ाव दिखाई देता है।
उनकी राजनीतिक यात्रा यह बताती है कि सामाजिक पृष्ठभूमि किसी व्यक्ति की राजनीतिक ऊंचाई तय नहीं करती। साधारण किसान परिवार से निकला व्यक्ति यदि संगठन, विचार और जनविश्वास के साथ आगे बढ़े तो प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल सकता है।
कल्याण सिंह के राजनीतिक जीवन की चर्चा रामजन्मभूमि आंदोलन के बिना अधूरी है। 1992 में अयोध्या की घटना के बाद मुख्यमंत्री पद से उनका इस्तीफा उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक अध्याय बना।
बाबूजी के समर्थक इसे सत्ता से अधिक सिद्धांत को महत्व देने के उदाहरण के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद भी कल्याण सिंह की स्मृति रामजन्मभूमि आंदोलन की राजनीतिक यात्रा से जोड़कर याद की जाती है।
पुण्यतिथि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कल्याण सिंह के व्यक्तित्व को याद करते हुए कहा कि कोई व्यक्ति केवल पद से बड़ा नहीं होता, बल्कि अपनी सोच और कर्मों से महान बनता है।
मुख्यमंत्री ने उनके किसान, शिक्षक, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और राज्यपाल के रूप में किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन मूल्यों और सिद्धांतों पर टिके रहने की प्रेरणा देता है।
यह संदेश बाबूजी की राजनीतिक विरासत के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें पदों से अधिक विचार और आचरण को महत्व दिया गया।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ती राजनीति के बीच कल्याण सिंह की पुण्यतिथि पर ‘हिंदू गौरव दिवस’ का आयोजन राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कल्याण सिंह की विरासत में हिंदुत्व, राम मंदिर और पिछड़ा वर्ग,तीनों राजनीतिक आयाम एक साथ दिखाई देते हैं।
भाजपा के लिए बाबूजी की विरासत इन सामाजिक और वैचारिक आधारों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी रही है। ऐसे में उनकी पुण्यतिथि पर प्रदेशभर से समर्थकों का जुटना राजनीतिक संदेश से भी खाली नहीं है।
इकाना में कार्यक्रम खत्म हुआ, नेता मंच से उतर गए, नारे धीरे-धीरे थम गए, लेकिन बाबूजी की तस्वीर के सामने खड़े लोगों की आंखों में एक अलग कहानी थी।
किसी के लिए वह नेता थे।
किसी के लिए समाज की आवाज।
किसी के लिए रामभक्त।
किसी के लिए संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक।
और लोधी समाज के हजारों लोगों के लिए वह ‘बाबूजी’ थे।
यही वजह है कि पांच साल बाद भी उनकी पुण्यतिथि पर जुटी भीड़ में केवल राजनीति नहीं, भावनाओं की मौजूदगी भी साफ दिखाई दी।
कल्याण सिंह की सबसे बड़ी विरासत सिर्फ उनकी तस्वीर, नाम या स्मारक नहीं है। असली सवाल यह है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले लोग उनके सिद्धांत, सादगी, स्पष्टता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की भावना को कितना आगे ले जाते हैं।

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