(विवेक रंजन श्रीवास्तव-विभूति फीचर्स)
लोकतंत्र मतपेटी से ही नहीं,मतभेद में भी जीवित रहता है। असहमति उसकी कमजोरी नहीं, प्राणवायु कही गई है। इसलिए धरना, प्रदर्शन,आंदोलन और हड़ताल लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं किंतु जब प्रतिरोध संवाद का विकल्प नहीं, उसका अवरोध बन जाए, तब लोकतंत्र स्वयं अपने सामने प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो जाता है।
भारत का इतिहास जनचेतना के आंदोलनों से आलोकित है। बुद्ध का करुणा पथ, संतों की सामाजिक चेतना और गांधी का सत्याग्रह,इन सबने सामाजिक प्रतिरोध को नैतिक ऊँचाई दी। दरअसल प्रतिरोध अवश्यसंभावी सेफ्टी वाल्व होते हैं । गांधी ने सिखाया कि आंदोलन का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को हराना नहीं, उसके विवेक को जगाना है।
स्वतंत्रता के बाद आंदोलनों ने लोकतंत्र को दिशा भी दी, पर धीरे-धीरे उनका स्वर बदलता गया। आज अनेक बार संवाद से पहले सड़कें भरती हैं, तर्क से पहले नारे गूँजते हैं और समाधान से पहले समाज विभाजित हो जाता है। राजनीति, शिक्षा और सामाजिक असंतोष के बीच अतिवाद का प्रवेश लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है। विरोध का अधिकार जितना पवित्र है, उतना ही दूसरे नागरिक का निर्बाध जीवन भी।
भारत में जैसे जंतर मंतर का स्थान राजनैतिक आंदोलनों हेतु एक व्यवस्था की तरह बनाया गया है, ठीक वैसे ही लंदन,न्यूयॉर्क,वाशिंगटन तथा अनेक दूसरे देशों में प्रदर्शन हेतु स्थान निर्धारित हैं, पर्यटक यह सब देखने भी जाते हैं।
दिल्ली का वर्तमान वास्तविक संकट आंदोलन नहीं, संवादहीनता है। जब संस्थाएँ सुनना छोड़ देती हैं, तब सड़कें बोलने लगती हैं। इसलिए भविष्य का लोकतंत्र विरोध की नहीं, संवाद की नई संस्कृति माँगता है। ऐसी व्यवस्था, जहाँ समयबद्ध जन-सुनवाई हो,सार्वजनिक विमर्श नीति-निर्माण का हिस्सा बने और आंदोलन अंतिम विकल्प हो, पहला हथियार नहीं।
लोकतंत्र की परिपक्वता भीड़ की ऊँची आवाज़ से नहीं, संवाद की गहराई से मापी जाए। भविष्य उसी समाज का है जहाँ असहमति संघर्ष नहीं, सहमति की खोज बने। लोकतंत्र की अगली यात्रा यदि सड़कों पर नहीं, संवाद की मेज़ पर लिखी जाए तो आदर्श स्थापित हो। (विभूति फीचर्स)


