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Saturday, July 4, 2026

पिघलते ग्लेशियर और बिगड़ता पर्यावरण

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– मानव अस्तित्व के सामने सबसे बड़ा संकट

प्रो. एच. एन. शर्मा
धरती पर जीवन का आधार जल, वायु और प्रकृति हैं। यदि इनमें से किसी एक का संतुलन बिगड़ जाए तो पूरी मानव सभ्यता संकट में पड़ सकती है। आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना शामिल है। हिमालय से लेकर अंटार्कटिका तक बर्फ की विशाल चट्टानें लगातार सिकुड़ रही हैं। यह केवल पहाड़ों का नहीं, बल्कि पूरी मानवता के भविष्य का सवाल है।

ग्लेशियर पृथ्वी के सबसे बड़े मीठे जल के भंडार हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया के लगभग 70% मीठे पानी का भंडार ग्लेशियरों और हिमचादरों में है। भारत की अधिकांश बड़ी नदियाँ गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सतलुज—हिमालयी ग्लेशियरों से ही निकलती हैं। इन नदियों पर करीब 60 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका निर्भर है।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, हिमालय में लगभग 54,000 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 75,000 वर्ग किलोमीटर है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण इनका आकार लगातार घट रहा है। आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान बढ़ने की वर्तमान गति जारी रही, तो 2100 तक हिमालय के 80 प्रतिशत तक ग्लेशियर पिघल सकते हैं। यह स्थिति एशिया के करोड़ों लोगों के लिए जल संकट पैदा कर सकती है।

भारत के गंगोत्री ग्लेशियर का उदाहरण सबसे चिंताजनक है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ग्लेशियर पिछले कई दशकों से हर वर्ष औसतन 10 से 20 मीटर तक पीछे खिसक रहा है। इसका सीधा असर गंगा नदी के जल प्रवाह और उत्तर भारत की जल सुरक्षा पर पड़ सकता है।

ग्लेशियरों के पिघलने का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वार्मिंग है। औद्योगीकरण, वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कोयले और पेट्रोलियम का अत्यधिक उपयोग, जंगलों की कटाई तथा बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ाया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.2 से 1.3 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है।

इसका परिणाम केवल ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है। समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। आईपीसीसी के अनुसार, वर्ष 1901 से 2018 के बीच वैश्विक समुद्री जलस्तर लगभग 20 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो इस सदी के अंत तक समुद्री तटीय क्षेत्रों में रहने वाले करोड़ों लोग विस्थापन का सामना कर सकते हैं।

भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। उत्तराखंड में 2021 की चमोली आपदा, केदारनाथ जैसी प्राकृतिक त्रासदियाँ और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती भूस्खलन की घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। असामान्य वर्षा, भीषण गर्मी, सूखा और अचानक आने वाली बाढ़ अब सामान्य घटनाएँ बनती जा रही हैं।

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अधिक से अधिक वृक्षारोपण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी, ऊर्जा की बचत, सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा, वर्षा जल संचयन तथा जल स्रोतों का संरक्षण इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति वर्ष में कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करे, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 को “ग्लेशियर संरक्षण का अंतरराष्ट्रीय वर्ष” घोषित किया है। इसका उद्देश्य दुनिया को यह संदेश देना है कि यदि आज ग्लेशियरों और पर्यावरण को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को जल संकट, खाद्य संकट और प्राकृतिक आपदाओं का गंभीर सामना करना पड़ेगा।

ग्लेशियर केवल बर्फ के पहाड़ नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन की जीवनरेखा हैं। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी जल सुरक्षित रहेगा, और जब जल सुरक्षित रहेगा, तभी मानव सभ्यता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इसलिए आज आवश्यकता केवल चर्चा की नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने की है। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।

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