भरत चतुर्वेदी
मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि उसे सोचने, समझने और बदलने की क्षमता मिली है। लेकिन विडंबना यह है कि जैसे-जैसे व्यक्ति सफलता, धन, पद या प्रसिद्धि हासिल करता है, वैसे-वैसे उसके भीतर घमंड भी घर करने लगता है। यही घमंड उसे दूसरों से दूर कर देता है और धीरे-धीरे वह अपने वास्तविक व्यक्तित्व से भी कटने लगता है।
एक साधारण पत्थर को देखिए। जब तक वह पहाड़ का हिस्सा होता है, उसकी कोई विशेष पहचान नहीं होती। मूर्तिकार अपनी छेनी और हथौड़ी से उस पर अनगिनत चोटें करता है। हर चोट उसके अनावश्यक हिस्से को हटाती है। अंततः वही पत्थर एक सुंदर प्रतिमा बनकर मंदिर में स्थापित होता है और लोग श्रद्धा से उसके सामने सिर झुकाते हैं। पत्थर ने चोटें सह लीं, इसलिए वह भगवान का स्वरूप बन गया।
लेकिन इंसान? वह अपने अहंकार पर एक चोट भी सहन नहीं कर पाता। कोई उसकी गलती बता दे, आलोचना कर दे या उसकी इच्छा के विरुद्ध बात हो जाए, तो उसका अहंकार आहत हो जाता है। वह संबंध तोड़ देता है, कटुता पाल लेता है या स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है।
सच्चाई यह है कि भगवान बनने के लिए पत्थर को तराशना पड़ता है और इंसान बनने के लिए अहंकार को। विनम्रता किसी व्यक्ति को छोटा नहीं करती, बल्कि उसे लोगों के दिलों में बड़ा बना देती है। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने महान कार्य किए, उनकी पहचान केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनके सरल स्वभाव और विनम्र आचरण से भी बनी।
आज समाज में रिश्ते टूट रहे हैं, संवाद कम हो रहा है और दूरियां बढ़ रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण अहंकार है। यदि हर व्यक्ति अपनी जिद और घमंड का थोड़ा-सा हिस्सा छोड़ दे, तो परिवारों में प्रेम लौट आएगा, मित्रता मजबूत होगी और समाज अधिक सौहार्दपूर्ण बन सकेगा।
याद रखिए, ऊंचा पद, बड़ी संपत्ति और प्रसिद्धि कुछ समय के लिए सम्मान दिला सकते हैं, लेकिन स्थायी सम्मान केवल अच्छे व्यवहार और विनम्रता से मिलता है। लोग आपकी सफलता को नहीं, आपके व्यवहार को अधिक समय तक याद रखते हैं।
- पत्थर ने चोटें सहकर भगवान बनने का सम्मान पाया, और इंसान यदि अपने घमंड को तोड़ दे, तो वह दूसरों के लिए प्रेरणा, सम्मान और प्रेम का पात्र बन सकता है। आखिरकार, मंदिरों में भगवान की मूर्तियों के सामने सिर झुकाए जाते हैं, लेकिन जीवन में लोग उसी इंसान के सामने झुकते हैं, जिसके भीतर अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता होती है।


