डॉ विजय गर्ग
मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक भाषा है। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, इतिहास, ज्ञान, परंपराओं और सामूहिक स्मृति का भंडार भी है। किंतु आज दुनिया एक ऐसे संकट का सामना कर रही है, जिस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह संकट है—वैश्विक शब्दावली का लगातार सिकुड़ना। भाषाविदों के अनुसार दुनिया भर में प्रतिदिन सैकड़ों शब्द उपयोग से बाहर हो जाते हैं और धीरे-धीरे हमेशा के लिए लुप्त हो जाते हैं।
यह केवल शब्दों का नुकसान नहीं है, बल्कि उन विचारों, अनुभवों और सांस्कृतिक धरोहरों का भी नुकसान है जो इन शब्दों में समाहित होती हैं।
भाषाओं के विलुप्त होने का बढ़ता खतरा
वर्तमान में विश्व में लगभग 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं। किंतु अनेक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि इनमें से लगभग आधी भाषाएँ इस शताब्दी के अंत तक समाप्त हो सकती हैं। जब कोई भाषा मरती है, तो उसके साथ हजारों विशिष्ट शब्द, मुहावरे, लोककथाएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भी समाप्त हो जाती हैं।
कई आदिवासी और स्थानीय भाषाओं में ऐसे शब्द मौजूद हैं जिनका अन्य भाषाओं में कोई सटीक अनुवाद नहीं है। ये शब्द स्थानीय प्रकृति, मौसम, सामाजिक संबंधों और जीवन-शैली से जुड़े विशिष्ट अनुभवों को व्यक्त करते हैं। भाषा के समाप्त होने के साथ ये अनुभव भी इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।
शब्द क्यों खो रहे हैं?
1. वैश्वीकरण का प्रभाव
आज अंग्रेज़ी, मंदारिन, स्पेनिश और हिंदी जैसी बड़ी भाषाओं का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। शिक्षा, व्यापार और रोजगार के अवसरों के लिए लोग इन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। परिणामस्वरूप छोटी भाषाएँ और उनकी शब्दावली धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाती हैं।
2. शहरीकरण और पलायन
गाँवों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन स्थानीय बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर कर रहा है। नई पीढ़ी अक्सर अपने पूर्वजों की भाषा नहीं सीखती, जिससे अनेक शब्द उपयोग से बाहर हो जाते हैं।
3. डिजिटल युग की चुनौतियाँ
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने संचार को आसान बनाया है, लेकिन इन मंचों पर कुछ चुनिंदा भाषाओं का प्रभुत्व है। जिन भाषाओं की डिजिटल उपस्थिति कम है, उनकी शब्दावली नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पाती।
4. बदलती जीवनशैली
समय के साथ अनेक पारंपरिक व्यवसाय, उपकरण और सामाजिक प्रथाएँ समाप्त हो रही हैं। इनके साथ जुड़े शब्द भी धीरे-धीरे लोगों की स्मृति से मिट रहे हैं। आज के युवाओं को ऐसे अनेक शब्दों का अर्थ भी ज्ञात नहीं है जो कुछ दशक पहले सामान्य बोलचाल का हिस्सा थे।
शब्दों के साथ क्या खो जाता है?
हर शब्द एक विचार, एक अनुभव और एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। कुछ भाषाओं में प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तनों के लिए विशेष शब्द होते हैं। कुछ में रिश्तों की जटिलताओं को व्यक्त करने वाले शब्द मिलते हैं। कुछ शब्द स्थानीय ज्ञान और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को संरक्षित रखते हैं।
जब कोई शब्द खो जाता है, तो केवल उसका उच्चारण या अर्थ नहीं मिटता, बल्कि मानव अनुभव का एक अनूठा पहलू भी समाप्त हो जाता है।
भाषा और सांस्कृतिक पहचान
भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है। लोकगीत, कहावतें, मुहावरे, लोककथाएँ और पारंपरिक ज्ञान भाषा के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। यदि भाषा कमजोर होती है, तो सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ने लगती है।
भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक अलग सांस्कृतिक संसार समेटे हुए है। इनका संरक्षण केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आवश्यकता भी है।
संरक्षण के प्रयास
सौभाग्य से दुनिया भर में कई संगठन और समुदाय संकटग्रस्त भाषाओं को बचाने के लिए कार्य कर रहे हैं। डिजिटल शब्दकोश बनाए जा रहे हैं, लोक साहित्य का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है और बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने के प्रयास किए जा रहे हैं।
हम भी कुछ सरल कदम उठा सकते हैं—
– घर में मातृभाषा का प्रयोग बढ़ाएँ।
– स्थानीय बोलियों और लोक साहित्य को प्रोत्साहित करें।
– बच्चों को अपनी भाषाई विरासत से परिचित कराएँ।
– डिजिटल माध्यमों पर स्थानीय भाषाओं में सामग्री तैयार करें।
– विलुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण अभियानों का समर्थन करें।
निष्कर्ष
वैश्विक शब्दावली संकट केवल भाषाविदों की चिंता नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की चिंता है। प्रतिदिन खोते सैकड़ों शब्द हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता कितनी नाजुक है।
यदि हम अपनी भाषाओं और शब्दों को संरक्षित नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल शब्द ही नहीं, बल्कि ज्ञान, परंपराएँ, लोक स्मृतियाँ और अपनी सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो देंगी। प्रत्येक बचाया गया शब्द मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं; वे मानव अनुभवों का जीवंत संग्रहालय हैं। इन्हें बचाना हमारी साझा जिम्मेदारी है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


