शरद कटियार
मनुष्य का मन अत्यंत चंचल और इच्छाओं से भरा हुआ होता है। जीवन के हर पड़ाव पर वह कुछ न कुछ प्राप्त करने की आकांक्षा रखता है। बचपन में खिलौने, युवावस्था में सफलता, नौकरी, सम्मान, धन और परिवार; और फिर जीवन के आगे के वर्षों में सुरक्षा, शांति और संतोष। इच्छाएँ बदलती रहती हैं, लेकिन उन्हें शीघ्र पूरा होते देखने की चाह शायद कभी समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि जब कोई इच्छा पूरी होने में समय लग जाता है, तो मन बेचैन हो उठता है।
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि ईश्वर ने हमें पहले से ही बहुत कुछ दिया है। स्वस्थ शरीर, सोचने-समझने की क्षमता, परिवार का स्नेह, मित्रों का साथ, प्रकृति की सुंदरता और जीवन जीने का अवसर ये सब ऐसे उपहार हैं जिनके बिना कोई भी बड़ी उपलब्धि अर्थहीन हो सकती है। फिर भी मनुष्य का ध्यान अक्सर उन आशीर्वादों पर नहीं जाता जो उसके पास हैं, बल्कि उस एक कमी पर अटक जाता है जो उसे दिखाई देती है।
जब हम किसी इच्छा को लेकर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, तो हमारे मन में उसकी एक निश्चित समय-सीमा भी होती है। हम चाहते हैं कि हमारी समस्या का समाधान तुरंत हो जाए, हमारी मेहनत का फल शीघ्र मिल जाए और हमारे सपने जल्द से जल्द साकार हो जाएँ। लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तब हमारे भीतर प्रश्न उठने लगते हैं “मेरी प्रार्थना क्यों नहीं सुनी गई?”, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है?”, “क्या मेरी मेहनत व्यर्थ चली जाएगी?”। धीरे-धीरे यही प्रश्न निराशा और हताशा का रूप लेने लगते हैं।
वास्तव में, ईश्वर का कार्य करने का तरीका मनुष्य की सोच से भिन्न होता है। हम वर्तमान को देखते हैं, जबकि ईश्वर भविष्य को भी जानते हैं। हम केवल अपनी इच्छा को देखते हैं, जबकि ईश्वर उसके परिणामों को भी समझते हैं। कई बार जो वस्तु, अवसर या संबंध हम आज चाहते हैं, वह शायद हमारे लिए उचित समय पर ही लाभदायक हो। यदि वह समय से पहले मिल जाए, तो संभव है कि वह हमारे लिए परेशानी का कारण बन जाए।
जीवन में पीछे मुड़कर देखने पर अनेक लोगों को यह अनुभव हुआ है कि जिन बातों के लिए वे कभी रोए थे, बाद में वही उनके लिए वरदान सिद्ध हुईं। जिस नौकरी के न मिलने पर वे दुखी हुए थे, बाद में उससे बेहतर अवसर मिला। जिस संबंध के टूटने पर उन्होंने स्वयं को असहाय समझा था, बाद में उन्हें अधिक सम्मान और प्रेम देने वाले लोग मिले। जिस कठिनाई को उन्होंने अभिशाप समझा था, वही उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाने का कारण बनी। उस समय उन्हें यह सब समझ नहीं आया, लेकिन समय ने स्पष्ट कर दिया कि ईश्वर की योजना उनकी योजना से कहीं बेहतर थी।
धैर्य का अर्थ केवल इंतजार करना नहीं है। धैर्य का अर्थ है,प्रतीक्षा करते हुए विश्वास बनाए रखना। यह मानना कि यदि आज उत्तर नहीं मिला है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई है। कभी-कभी ईश्वर हमारी प्रार्थना का उत्तर तीन प्रकार से देते हैं,हाँ, अभी नहीं, या मैंने तुम्हारे लिए इससे बेहतर कुछ रखा है। दुर्भाग्य से हम केवल “हाँ” सुनना चाहते हैं और बाकी दो उत्तरों को समझ नहीं पाते।
बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। गर्भ में पल रहे शिशु को जन्म लेने के लिए निश्चित अवधि चाहिए। सूर्योदय भी अपने समय पर ही होता है। प्रकृति का प्रत्येक नियम हमें यही सिखाता है कि महान और स्थायी चीज़ें समय लेकर ही विकसित होती हैं। यदि प्रकृति स्वयं धैर्य के सिद्धांत पर चलती है, तो मनुष्य को भी अपने जीवन में इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
आज का युग त्वरित परिणामों का युग है। मोबाइल पर एक क्लिक में जानकारी मिल जाती है, ऑनलाइन खरीदारी कुछ घंटों में घर पहुँच जाती है, और लोग हर काम का परिणाम तुरंत चाहते हैं। लेकिन जीवन के सबसे महत्वपूर्ण उपहार सफलता, सम्मान, प्रेम, विश्वास, अनुभव और आत्मिक शांति—कभी भी तुरंत नहीं मिलते। इन्हें पाने के लिए समय, संघर्ष, धैर्य और विश्वास की आवश्यकता होती है।
इसलिए जब जीवन में कोई इच्छा पूरी होने में देर हो, तो निराश न हों। अपनी प्रार्थना, अपनी मेहनत और अपने विश्वास को बनाए रखें। यह संभव है कि जिस दरवाजे को आप बार-बार खटखटा रहे हैं, उसके पीछे आपके लिए कुछ छोटा हो, जबकि ईश्वर आपके लिए किसी बड़े द्वार को खोलने की तैयारी कर रहे हों।
याद रखिए, ईश्वर कभी भी किसी सच्ची प्रार्थना को अनसुना नहीं करते। वे केवल उचित समय और उचित रूप में उसका उत्तर देते हैं। इसलिए यदि आज आपकी इच्छा पूरी नहीं हुई है, तो इसे असफलता न समझें। हो सकता है कि यह केवल प्रतीक्षा का समय हो, और आने वाला कल आपकी कल्पना से कहीं अधिक सुंदर हो। धैर्य रखिए, विश्वास बनाए रखिए, क्योंकि ईश्वर की योजना हमेशा हमारी समझ से बड़ी और हमारे हित में होती है।


