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Monday, June 22, 2026

भारत क्या अर्थव्यवस्था की क्षमता से अधिक स्नातक तैयार कर रहा है?

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डॉ विजय गर्ग

भारत को लंबे समय से “युवा देश” कहा जाता है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत हर वर्ष लाखों छात्रों को विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से स्नातक के रूप में तैयार करता है। शिक्षा के प्रसार, नए विश्वविद्यालयों की स्थापना और उच्च शिक्षा तक बढ़ती पहुंच ने देश में स्नातकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और युवाओं के सामने खड़ा है—क्या भारत अपनी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता से अधिक स्नातक तैयार कर रहा है?

यह प्रश्न केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल विकास, उद्योग की मांग और आर्थिक संरचना से भी जुड़ा हुआ है।

बढ़ती उच्च शिक्षा, बढ़ती उम्मीदें

पिछले दो दशकों में भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कला, विज्ञान, वाणिज्य और अन्य विषयों में लाखों विद्यार्थी हर वर्ष डिग्री प्राप्त करते हैं। परिवारों के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री सामाजिक प्रतिष्ठा और बेहतर भविष्य का प्रतीक बन चुकी है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि डिग्री प्राप्त करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा। कई युवा ऐसे कार्य कर रहे हैं जिनके लिए विश्वविद्यालय की डिग्री आवश्यक नहीं है, जबकि कुछ लंबे समय तक बेरोजगार रहते हैं।

बेरोजगारी और अधूरा रोजगार

भारत में समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं, बल्कि “अधूरा रोजगार” (Underemployment) की भी है। अनेक स्नातक ऐसे कार्यों में लगे हुए हैं जिनमें उनकी शिक्षा और कौशल का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता।

उदाहरण के लिए:

इंजीनियरिंग स्नातक गैर-तकनीकी नौकरियों में कार्य कर रहे हैं।

स्नातकोत्तर युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं।

निजी क्षेत्र में उपलब्ध नौकरियों का वेतन कई बार शिक्षा में किए गए निवेश के अनुपात में नहीं होता।

इससे यह धारणा मजबूत होती है कि अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां नहीं बना रही जितनी तेजी से स्नातक तैयार हो रहे हैं।

कौशल और डिग्री के बीच अंतर

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल स्नातकों की संख्या नहीं है, बल्कि उनके कौशल और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच का अंतर भी है।

कई कंपनियां शिकायत करती हैं कि:

छात्रों में व्यावहारिक कौशल की कमी है।

संचार क्षमता कमजोर है।

समस्या समाधान और नवाचार की क्षमता पर्याप्त नहीं है।

आधुनिक तकनीकों का अनुभव सीमित है।

इस स्थिति को अक्सर “स्किल गैप” कहा जाता है। इसका अर्थ है कि डिग्री होने के बावजूद छात्र रोजगार के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

क्या सभी को विश्वविद्यालय जाना चाहिए?

भारत में लंबे समय तक यह धारणा रही कि सफलता का रास्ता केवल विश्वविद्यालय की डिग्री से होकर गुजरता है। परिणामस्वरूप व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल आधारित कार्यक्रमों को अपेक्षित महत्व नहीं मिला।

जबकि विकसित देशों में बड़ी संख्या में युवा:

तकनीकी प्रशिक्षण लेते हैं,

अप्रेंटिसशिप करते हैं,

कौशल आधारित प्रमाणपत्र प्राप्त करते हैं,

और सीधे उद्योगों में प्रवेश करते हैं।

भारत में भी अब यह समझ बढ़ रही है कि हर विद्यार्थी के लिए चार वर्षीय डिग्री कार्यक्रम ही सर्वोत्तम विकल्प नहीं हो सकता।

अर्थव्यवस्था की संरचना और रोजगार

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन रोजगार सृजन की गति हमेशा समान नहीं रही। सेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अवसर बढ़े हैं, परंतु विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र अभी भी उतनी बड़ी संख्या में रोजगार नहीं दे पाया है जितनी आवश्यकता है।

यदि अर्थव्यवस्था अधिक उत्पादक उद्योगों, अनुसंधान, हरित प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में विस्तार करती है, तो उच्च शिक्षित युवाओं के लिए अधिक अवसर पैदा हो सकते हैं।

डिग्री का अवमूल्यन?

जब किसी समाज में बड़ी संख्या में लोग समान डिग्री प्राप्त कर लेते हैं, तो उस डिग्री का रोजगार बाजार में महत्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसे “Credential Inflation” कहा जाता है।

आज कई नौकरियों में स्नातक डिग्री न्यूनतम योग्यता बन चुकी है, जबकि कुछ दशक पहले वही कार्य कम शिक्षा वाले लोग भी कर लेते थे। इससे युवाओं पर अधिक शिक्षा प्राप्त करने का दबाव बढ़ता है, लेकिन रोजगार की गारंटी नहीं मिलती।

समाधान क्या हो सकता है?

1. कौशल आधारित शिक्षा

विश्वविद्यालयों को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित करने चाहिए।

2. व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा

आईटीआई, पॉलिटेक्निक, अप्रेंटिसशिप और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अधिक सम्मान और अवसर मिलने चाहिए।

3. उद्योग-शिक्षा साझेदारी

कॉलेजों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाकर छात्रों को वास्तविक कार्य अनुभव दिया जा सकता है।

4. उद्यमिता को प्रोत्साहन

हर स्नातक को नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नौकरी पैदा करने वाला बनने के लिए भी प्रेरित किया जाना चाहिए।

5. रोजगार सृजन

सरकार और निजी क्षेत्र को उच्च गुणवत्ता वाले रोजगारों के निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा।

निष्कर्ष

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारत केवल “बहुत अधिक स्नातक” तैयार कर रहा है। वास्तविक समस्या यह है कि शिक्षा प्रणाली, कौशल विकास और रोजगार बाजार के बीच संतुलन अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है। भारत को अधिक शिक्षित नागरिकों की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही ऐसे स्नातकों की भी जरूरत है जो उद्योगों की मांग के अनुरूप कौशल रखते हों।

भविष्य की सफलता केवल डिग्रियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि शिक्षा युवाओं को कितना सक्षम, नवाचारी और रोजगार योग्य बनाती है। यदि शिक्षा और अर्थव्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाता है, तो भारत की विशाल युवा आबादी एक चुनौती नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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