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Saturday, June 20, 2026

भ्रष्टाचार के लिए केवल विभाग के अधिकारी ही नहीं, राजतन्त्र भी दोषी

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डॉ एस. के. त्रिपाठी
भ्रष्टाचार किसी भी राष्ट्र की प्रगति में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। सामान्यतः जब किसी विभाग में भ्रष्टाचार की चर्चा होती है, तो उसके लिए केवल अधिकारियों और कर्मचारियों को दोषी ठहराया जाता है। निस्संदेह, वे भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष भागीदार होते हैं, परन्तु यह मान लेना कि केवल विभागीय अधिकारी ही इसके लिए उत्तरदायी हैं, उचित नहीं है। शासन व्यवस्था अथवा राजतन्त्र (शासक वर्ग) की नीतियाँ, कार्यप्रणाली और उत्तरदायित्वहीनता भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
किसी भी विभाग का संचालन सरकार द्वारा बनाए गए नियमों और नीतियों के अनुसार होता है। यदि शासन पारदर्शी, उत्तरदायी और कठोर नियंत्रण वाला हो, तो भ्रष्टाचार की संभावनाएँ स्वतः कम हो जाती हैं। इसके विपरीत, जब नियम जटिल हों, निगरानी कमजोर हो और दोषियों को दण्ड न मिले, तब अधिकारी भ्रष्ट आचरण के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इस प्रकार शासन की कमियाँ भी भ्रष्टाचार के लिए उत्तरदायी बनती हैं।
राजनीतिक हस्तक्षेप भी भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण है। कई बार अधिकारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण तथा पदोन्नति योग्यता के आधार पर न होकर राजनीतिक प्रभाव के आधार पर होती है। ऐसी स्थिति में अधिकारी अपने कर्तव्यों के प्रति कम और राजनीतिक संरक्षण देने वालों के प्रति अधिक उत्तरदायी हो जाते हैं। परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी हो जाती हैं।
इसके अतिरिक्त, यदि शासन स्वयं नैतिकता और ईमानदारी का उदाहरण प्रस्तुत न करे, तो प्रशासनिक तंत्र से आदर्श आचरण की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। शीर्ष स्तर पर होने वाली अनियमितताएँ और घोटाले अधीनस्थ अधिकारियों के लिए भी गलत संदेश देते हैं। इसलिए शासन और प्रशासन दोनों का चरित्र स्वच्छ होना आवश्यक है।
हालाँकि यह भी सत्य है कि प्रत्येक अधिकारी को अपने कर्तव्य और नैतिक दायित्व का पालन करना चाहिए। व्यक्तिगत ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए भ्रष्टाचार के लिए केवल राजतन्त्र या केवल अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। दोनों की जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को सर्वोपरि रखें।
अन्ततः कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार एक सामूहिक समस्या है, जिसके लिए विभागीय अधिकारी और शासन व्यवस्था दोनों उत्तरदायी हैं। जब तक शासन की नीतियाँ पारदर्शी नहीं होंगी और अधिकारी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करेंगे, तब तक भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। अतः भ्रष्टाचार-मुक्त समाज के निर्माण के लिए शासन और प्रशासन दोनों को समान रूप से उत्तरदायी बनाना आवश्यक है।

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