
डॉ विजय गर्ग
यह इंसान के पतन की पराकाष्ठा ही है कि समाज में बच्चों, वृद्धों, बीमारों व कमजोर लोगों के स्वास्थ्यवर्धन हेतु डॉक्टर दूध-घी-फल लेने को कहे, लेकिन जब उन्हें ये मिले तो उसमें भारी मिलावट पायी जाए। लोग अस्पतालों में बीमारियों से जूझते अपने परिजनों को शीघ्र ठीक करने के लिये दूध व जूस आदि देते हैं, लेकिन उनमें भी यदि घातक रसायन मिले होंगे, तो वे कैसे ठीक हो सकते हैं?
पिछले दिनों राजस्थान से अलीगढ़ लाया जा रहा सैकड़ों किलो घी बरामद हुआ। हापुड़ में करीब 22 लाख का नकली शहद पकड़ा गया। सोमनाथ में किडनी-लीवर को नुकसान पहुंचाने वाला यूरिया, डिटर्जेंट व कास्टिक सोडा मिला तीन हजार लीटर दूध बरामद होने की खबरें मीडिया में तैरती रहीं। आखिर लोभी मनुष्य के पतन की कोई सीमा भी है? चंद रुपयों के मुनाफे के लिये हम अपना दीन-ईमान बेचने के लिये कैसे तैयार हो जाते हैं? जीवन रक्षक दवा से लेकर खानपान में मिलावट की लगातार आने वाली खबरें विचलित करती हैं कि क्या खाएं और क्या न खाएं।
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पहले कहा जाता था कि ऊपर वाले से डर के कह रहा हूं। लोगों में नैतिकता का भाव होता था। समाज में धारणा थी कि दूसरों के लिये कुंआ खोदने वाला खुद के लिये खाई खोद रहा होता है। लेकिन आखिर समाज में ऐसा क्या हुआ कि लोगों में दुनिया की रचना करने वाले का भय व लोककल्याण का भाव खत्म हो गया। निश्चय ही ये रामराज जैसा वक्त नहीं है। हर दौर में अच्छे-बुरे लोग होते ही हैं। नकारात्मक सोच व दूसरों को कष्ट देकर खुश होने वाले रुग्ण मानसिकता के लोग हर काल खंड में पाये जाते रहे हैं। लेकिन उनका प्रतिशत कम रहा है। आज तो हर व्यक्ति मुनाफे से रातों-रात धनी हो जाना चाहता है,अब चाहे किसी की जान भी जाए, उसकी बला से। निस्संदेह, ये घटनाएं किसी सभ्य के माथे पर कलंक जैसी ही हैं।
हम अक्सर सुनते हैं कि फलों को तुरत-फुरत पकाने वाले रसायनों का जमकर प्रयोग किया जा रहा है। हरी सब्जी व फलों को घातक रसायन से चमकदार बनाया जा रहा है। दरअसल, तुरंत फसल लेने के लिये ऐसे घातक रसायन प्रयोग किए जा रहे हैं, जिन पर तमाम सभ्य समाजों में पूर्ण प्रतिबंध है। लेकिन हमारे देश में ऐसा नियामक तंत्र विकसित ही नहीं हो पाया है, जो ऐसे मामलों में तुरत-फुरत जांच करे और तत्काल मिलावटखोरों को सजा दिलाए। विडंबना यह भी है कि हमारे समाज में स्वयं सेवी संगठन या जागरूक लोग इस गंभीर संकट के प्रति संवेदनशील नहीं हैं।
शासन-प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि हर शहर में मिलावटी सामान की जांच करने वाली लैब की सहज उपलब्धता क्यों नहीं है? जिन विभागों के अधिकारियों के पास जांच-पड़ताल का दायित्व होता है, वे चुप क्यों रहते हैं? दीपावली व अन्य त्योहारों पर जनाक्रोश के चलते कुछ छोटे हलवाइयों पर कार्रवाई होती है, मगर बड़ी मछलियां साफ बच निकलती हैं। क्या इन अधिकारियों की खामोशी में चांदी के जूते की चोट शामिल होती है? यह किसी से नहीं छिपा कि ये मलाईदार पोस्ट कितने लेन-देन के बाद मिलती हैं। राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक को लेन-देन के बाद ही उनकी पांचों उंगलियां घी में होती है। फिर वे भी नियुक्ति में किए गए निवेश की वसूली में जुट जाते हैं। निश्चय ही एक कारगर तंत्र को विकसित किए बिना इस घृणित कारोबार पर लगाम लगना संभव नहीं है। हम जानते हैं कि जब से देश में सीसीटीवी कैमरों का प्रयोग बढ़ा है, लाखों सच सामने आए हैं। अन्यथा ये सच कभी अनावृत न होते। ऐसी ही कोई कारगर तकनीक मिलावट रोकेगी। जयपुर के खाद्य सुरक्षा विभाग ने पिछले दिनों पैकेज्ड फूड आइटम्स पर लिखी एक्सपायरी डेट मिटाने वाले अत्याधुनिक उपकरण बरामद किए। तो ऐसे में एक्सपायरी डेट देखकर सामान खरीदने वाला आम आदमी क्या करेगा? निश्चय ही अनैतिक रूप से मुनाफा कमाने वाले लोग सख्त सजा के हकदार हैं। देश में मिलावटखोरी रोकने के लिए तुरंत सख्त कानून बनाने की जरूरत है। अन्यथा अस्पतालों में मिलावटी खाद्य पदार्थों से लीवर-किडनी खराब करवाने वाले मरीजों की लंबी कतारें हमारे समाज की हकीकत बनी रहेगी।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


