शरद कटियार
21वीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया एक बड़े सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। इस परिवर्तन के केंद्र में है जेनरेशन-ज़ी, यानी वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी वह युवा पीढ़ी, जो इंटरनेट, सोशल मीडिया और वैश्विक सूचनाओं के युग में बड़ी हुई है। आज दुनिया की सरकारें, राजनीतिक दल, उद्योग जगत और सामाजिक संगठन इस पीढ़ी को बेहद गंभीरता से देख रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि आने वाले वर्षों में लोकतंत्र की दिशा और दशा तय करने में इसी पीढ़ी की निर्णायक भूमिका होने वाली है।
भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कई चुनौतियों से जूझ रही हैं। बढ़ता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक अक्षमताएं, आर्थिक असमानता और व्यवस्था की खामियां आम नागरिकों में असंतोष पैदा कर रही हैं। युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार की गारंटी क्यों नहीं है? सरकारी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव क्यों दिखाई देता है? विकास के दावों के बावजूद आम आदमी की समस्याएं क्यों बनी हुई हैं?
आज भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक दलों की निगाहें युवाओं पर केंद्रित हों। यही कारण है कि लगभग सभी राजनीतिक दल अब युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए नए प्रयोग कर रहे हैं। उन्हें यह अहसास हो चुका है कि आने वाले चुनावों और राजनीतिक विमर्श का केंद्र युवा मतदाता ही होगा।
लेकिन युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें वास्तविक मुद्दों और भावनात्मक मुद्दों के बीच अंतर समझना होगा। पिछले कई दशकों में भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण और पहचान आधारित राजनीति का प्रभाव लगातार बढ़ा है। चुनावी रणनीतियां अक्सर जाति, धर्म और समुदायों के आधार पर बनाई जाती रही हैं। इससे राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है, लेकिन इससे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और औद्योगिक विकास जैसी मूल समस्याओं का समाधान नहीं होता।
यह भी सच है कि जाति आधारित असमानताएं भारतीय समाज की ऐतिहासिक वास्तविकता रही हैं और सामाजिक न्याय की नीतियों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन जब जाति और धर्म केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाएं और विकास के मुद्दे पीछे छूट जाएं, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ सरकारों से जवाबदेही भी मांगें।
जेनरेशन-ज़ी की सबसे बड़ी ताकत उसकी सूचना तक पहुंच है। आज का युवा केवल स्थानीय अखबार या टीवी चैनलों पर निर्भर नहीं है। वह दुनिया भर की घटनाओं को मोबाइल फोन पर देख रहा है। वह विभिन्न देशों की नीतियों, आर्थिक मॉडलों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की तुलना कर सकता है। यही कारण है कि यह पीढ़ी पारंपरिक राजनीतिक नारों से अधिक रोजगार, अवसर, पारदर्शिता और सुशासन की अपेक्षा रखती है।
दुनिया के कई देशों में युवा आंदोलनों ने राजनीतिक बदलावों की नींव रखी है। चाहे जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान हो या लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई, युवाओं ने हर जगह निर्णायक भूमिका निभाई है। भारत में भी यह संभावना मौजूद है कि आने वाले वर्षों में युवा मतदाता राजनीति की प्राथमिकताओं को बदल दें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक बहस का केंद्र रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि सुधार, तकनीकी नवाचार और आर्थिक अवसर बनें। यदि युवा पीढ़ी इन मुद्दों को प्राथमिकता देती है तो लोकतंत्र अधिक मजबूत और जवाबदेह बन सकता है।
जेनरेशन-ज़ी केवल एक आयु वर्ग नहीं, बल्कि एक विचार परिवर्तन का प्रतीक है। यह वह पीढ़ी है जो सवाल पूछना जानती है, सूचना की सत्यता जांच सकती है और सत्ता से जवाब मांगने का साहस रखती है। यदि यह पीढ़ी जाति और धर्म की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर विकास, सुशासन और सामाजिक न्याय के संतुलित एजेंडे को अपनाती है, तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लोकतंत्रों को नई ऊर्जा मिल सकती है।
लोकतंत्र की असली शक्ति मतदान में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकता में निहित होती है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि जेनरेशन-ज़ी भावनात्मक ध्रुवीकरण का हिस्सा बनती है या लोकतांत्रिक सुधारों की वाहक। यदि युवा पीढ़ी सही प्रश्न पूछने और सही मुद्दों को चुनने में सफल होती है, तो वह केवल सरकारें नहीं बदलेगी, बल्कि शासन की संस्कृति भी बदल सकती है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया की नजर जेनरेशन-ज़ी पर टिकी हुई है।


