विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष—वन, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संतुलन का गहरा संबंध
लेखक: डॉ. कृष्णा मिश्रा (पीएचडी, वानिकी)
“पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को नहीं।” — महात्मा गांधी
वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट केवल एक सामान्य चिंता का विषय नहीं, बल्कि एक जटिल वैज्ञानिक चुनौती के रूप में उभर चुका है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास तथा पारिस्थितिकी तंत्र की गिरती कार्यक्षमता आज वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
अंतरसरकारी पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के अनुसार, औद्योगिक क्रांति के बाद से वैश्विक औसत तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 420 पीपीएम के आसपास पहुँच चुकी है, जो पृथ्वी के जलवायु तंत्र में असंतुलन का स्पष्ट संकेत है। इसके परिणामस्वरूप चरम मौसमी घटनाएँ—जैसे सूखा, बाढ़ और हीटवेव—अधिक तीव्र एवं आवृत्त हो रही हैं।
इस संदर्भ में वन पारिस्थितिकी तंत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत वन सर्वेक्षण रिपोर्ट (2023) के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण लगभग 25.17 प्रतिशत है। भारतीय वनों में लगभग 7,285 मिलियन टन कार्बन का भंडारण है, जिसमें मृदा कार्बन का योगदान सर्वाधिक है। यह दर्शाता है कि वन केवल जैविक द्रव्यमान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक कार्बन चक्र के एक महत्वपूर्ण घटक हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो वन पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता, जिसे नेट प्राइमरी प्रोडक्टिविटी (NPP) कहा जाता है, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रही है। बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा के कारण वनों की कार्बन अवशोषण क्षमता में गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही है, जो भविष्य में जलवायु संकट को और गहरा कर सकती है।
“हम पृथ्वी को अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं पाते, बल्कि इसे अपने बच्चों से उधार लेते हैं।” — नेटिव अमेरिकी कहावत
जैव विविधता इस पूरे तंत्र का आधार है। पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और लचीलापन (Resilience) प्रजातियों की विविधता पर निर्भर करता है। वर्तमान में अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं, जो पारिस्थितिक सेवाओं—जैसे परागण, जल शुद्धिकरण और मृदा उर्वरता—पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं।
सतत विकास की अवधारणा इस संकट का समग्र समाधान प्रस्तुत करती है। वन आधारित समाधान (Nature-based Solutions) जैसे कृषि-वनीकरण, सामाजिक वानिकी तथा शहरी हरित क्षेत्र का विस्तार, कार्बन न्यूनीकरण के साथ-साथ आजीविका संवर्धन में भी सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
भारत ने पेरिस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2030 तक अतिरिक्त 2.5 से 3.0 बिलियन टन कार्बन सिंक सृजित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसमें वन एवं वृक्ष आवरण की भूमिका निर्णायक होगी।
अंततः, यह स्पष्ट है कि पर्यावरण केवल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि पृथ्वी की पारिस्थितिक स्थिरता और मानव विकास की आधारशिला है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नीतिगत समर्थन और जनसहभागिता का समन्वय किया जाए, तो पर्यावरणीय संतुलन को पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर यह संकल्प आवश्यक है कि हम पर्यावरण संरक्षण को केवल एक दिवस तक सीमित न रखकर अपनी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बनाएं—क्योंकि प्रकृति के साथ संतुलन ही मानवता के सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी है।
“पर्यावरण केवल संरक्षण का विषय नहीं,
बल्कि सतत विकास की आधारशिला है।”


