डॉ विजय गर्ग
गर्मियों के दिनों में, व्यायाम करते समय या तनावपूर्ण परिस्थितियों में हमारे शरीर से पसीना निकलना एक सामान्य घटना है। अधिकांश लोग पसीने को केवल असुविधा या बदबू से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह मानव शरीर की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल जैविक प्रक्रिया है। पसीना हमारे शरीर का प्राकृतिक एयर-कंडीशनर है, जो तापमान को नियंत्रित रखने और कई शारीरिक कार्यों को सुचारु रूप से चलाने में मदद करता है।
मानव शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब बाहरी तापमान बढ़ता है या शारीरिक गतिविधियों के कारण शरीर अधिक गर्मी पैदा करता है, तब शरीर को इस अतिरिक्त ऊष्मा से छुटकारा पाने की आवश्यकता होती है। यहीं पर पसीना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। त्वचा में मौजूद लाखों स्वेद ग्रंथियां पानी और लवणों से युक्त द्रव का स्राव करती हैं। जब यह द्रव त्वचा की सतह से वाष्पित होता है, तो वह शरीर से ऊष्मा को भी साथ ले जाता है, जिससे शरीर ठंडा हो जाता है।
मनुष्य के शरीर में मुख्य रूप से दो प्रकार की स्वेद ग्रंथियां होती हैं—एक्राइन और एपोक्राइन ग्रंथियां। एक्राइन ग्रंथियां पूरे शरीर में फैली होती हैं और तापमान नियंत्रण का मुख्य कार्य करती हैं। दूसरी ओर, एपोक्राइन ग्रंथियां मुख्यतः बगल, कमर और कुछ अन्य क्षेत्रों में पाई जाती हैं। ये भावनात्मक तनाव, भय या उत्तेजना की स्थिति में सक्रिय होती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पसीना स्वयं लगभग गंधहीन होता है। शरीर से आने वाली दुर्गंध वास्तव में त्वचा पर मौजूद बैक्टीरिया के कारण उत्पन्न होती है। जब बैक्टीरिया पसीने में मौजूद जैविक पदार्थों को तोड़ते हैं, तब विशिष्ट गंध पैदा होती है। यही कारण है कि स्वच्छता बनाए रखने से शरीर की दुर्गंध को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पसीना केवल शरीर को ठंडा करने का काम ही नहीं करता, बल्कि यह शरीर में जल और खनिज संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। पसीने के माध्यम से थोड़ी मात्रा में सोडियम, पोटैशियम और अन्य खनिज भी बाहर निकलते हैं। अत्यधिक पसीना आने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है, इसलिए गर्म मौसम या भारी व्यायाम के दौरान पर्याप्त पानी पीना आवश्यक होता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य की पसीना बहाने की क्षमता अन्य कई स्तनधारियों की तुलना में अधिक विकसित है। यही विशेषता मानव जाति के विकास में महत्वपूर्ण रही है। माना जाता है कि हमारे पूर्वज लंबी दूरी तक दौड़ने और शिकार करने में इसलिए सक्षम थे क्योंकि उनका शरीर पसीने के माध्यम से प्रभावी ढंग से ठंडा हो सकता था। यह क्षमता उन्हें गर्म वातावरण में भी सक्रिय बनाए रखती थी।
पसीना हमारे मानसिक और भावनात्मक अनुभवों से भी जुड़ा हुआ है। परीक्षा, साक्षात्कार, मंच पर भाषण या किसी तनावपूर्ण परिस्थिति में हथेलियों और माथे पर आने वाला पसीना शरीर की “लड़ो या भागो” प्रतिक्रिया का हिस्सा होता है। यह प्रतिक्रिया हमारे तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित होती है और संभावित खतरे के लिए शरीर को तैयार करती है।
हाल के वर्षों में वैज्ञानिक पसीने को स्वास्थ्य निगरानी के एक नए साधन के रूप में भी देख रहे हैं। आधुनिक तकनीक की मदद से ऐसे पहनने योग्य सेंसर विकसित किए जा रहे हैं जो पसीने का विश्लेषण करके शरीर में ग्लूकोज, इलेक्ट्रोलाइट्स और अन्य जैविक संकेतकों की जानकारी दे सकते हैं। भविष्य में यह तकनीक रोगों के निदान और स्वास्थ्य प्रबंधन को और आसान बना सकती है।
हालांकि पसीना शरीर के लिए लाभकारी है, लेकिन अत्यधिक या असामान्य पसीना कभी-कभी स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकता है। हाइपरहाइड्रोसिस जैसी स्थितियों में व्यक्ति को सामान्य से कहीं अधिक पसीना आता है, जबकि कुछ रोगों में पसीना कम या बिल्कुल नहीं आता। ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक होता है।
पसीना मानव शरीर की एक साधारण प्रतीत होने वाली, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यह न केवल हमें गर्मी से बचाता है, बल्कि हमारे विकास, स्वास्थ्य और जीवित रहने की क्षमता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। अगली बार जब गर्मी के कारण आपके माथे पर पसीने की बूंदें उभरें, तो याद रखिए कि यह शरीर की एक अद्भुत वैज्ञानिक व्यवस्था है, जो हर पल आपको सुरक्षित और संतुलित बनाए रखने के लिए काम कर रही है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


