– आज़ादी की लड़ाई से लोकतंत्र की रीढ़ तक मीडिया की अहम भूमिका
– चौथा स्तम्भ कहना इतिहास के साथ अन्याय!
– अंग्रेज बंदूक से नहीं कलम और खबर से डरते थे
– आज मीडिया सत्ता का साधन बन रही, ये हमारे पूर्वजों के अपमान की बात

शरद कटियार
भारत में अक्सर कहा जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का “चौथा स्तम्भ” है, लेकिन इतिहास की परतें उठाकर देखें तो यह परिभाषा अधूरी ही नहीं, बल्कि कई मायनों में भ्रामक भी नजर आती है। जिस देश की आज़ादी की लड़ाई खुद अखबारों, लेखों और जनमत से लड़ी गई हो, जहां स्वतंत्रता सेनानी ही पत्रकार हों, वहां मीडिया को चौथे पायदान पर रखना क्या इतिहास के साथ अन्याय नहीं है? यही सवाल अब नई बहस को जन्म दे रहा है,क्या मीडिया वास्तव में पहला स्तम्भ है?
आजादी की लड़ाई में मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं था, बल्कि आंदोलन का हथियार था। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने 1942 में “आज़ाद हिन्द रेडियो” की स्थापना कर दी थी जिसके जरिए सीधे देशवासियों तक संदेश पहुंचाया जाता था । उस समय ब्रिटिश सरकार के दमन के बीच यह रेडियो नेटवर्क ही था जिसने क्रांतिकारी चेतना को जिंदा रखा।
इसी तरह जवाहरलाल नेहरू ने 1938 में नेशनल हेराल्ड की स्थापना की। यह सिर्फ एक अखबार नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ वैचारिक मोर्चा था। इसके लेखों ने लाखों युवाओं को आंदोलन से जोड़ा।और उन्होंने आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बन देश का नेतृत्व किया।
महात्मा गाँधी ने तो पत्रकारिता को सीधे आंदोलन का केंद्र बना दिया। “इंडियन ओपिनियन ” (1903), “यंग इंडिया ” (1919), “नवजीवन ” (1919) और “हरिजन ” (1933) ये केवल प्रकाशन नहीं थे, बल्कि जनजागरण के औजार थे। गांधी के लेख सीधे लोगों के दिल और दिमाग पर असर डालते थे।आजाद भारत मे वो भारत के राष्ट्रपिता माने जाते हैं।
वहीं राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता भी लेखन और संपादकीय गतिविधियों से जुड़े रहे, और आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति बन देश के नीतिनिर्धारक बने, उनका गहरा जुड़ाव देश नामक साप्ताहिक पत्र से रहा,जबकि बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी ने “मूकनायक ” (1920), “बहिष्क्रित भारत ” (1927), “जनता ” (1930) जैसे प्रकाशनों के जरिए सामाजिक क्रांति की नींव रखी, और आजाद भारत के संबिधान निर्माता हुए।
अब आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। 1920 से 1947 के बीच भारत में सैकड़ों अखबार और पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही थीं, जिनमें से बड़ी संख्या स्वतंत्रता आंदोलन से सीधे जुड़ी थी। ब्रिटिश सरकार ने करीब 300 से अधिक प्रकाशनों पर प्रतिबंध लगाए, दर्जनों संपादकों को जेल में डाला गया और भारी जुर्माने लगाए गए। यह साबित करता है कि अंग्रेज भी जानते थे,असली खतरा बंदूक से नहीं, बल्कि कलम और खबर से है।
यही कारण है कि मीडिया को केवल “चौथा स्तम्भ” कहना उसके ऐतिहासिक योगदान को कम करके आंकना है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तो बाद में संस्थागत रूप में मजबूत हुए, लेकिन मीडिया ने सबसे पहले जनता को जागरूक किया, आंदोलन खड़ा किया और सत्ता को चुनौती दी।
आज के दौर में भी मीडिया की भूमिका कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ी है। डिजिटल युग में खबरें सेकंडों में फैलती हैं, सरकार के फैसले तुरंत जनता की नजर में आते हैं और जनमत तेजी से बनता है। लेकिन इसी के साथ मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल भी उठ रहे हैं,टीआरपी, राजनीतिक झुकाव और कॉरपोरेट दबाव जैसे मुद्दे इसकी साख को चुनौती दे रहे हैं।
यही वह मोड़ है जहां देश को नई बहस की जरूरत है। सवाल केवल इतना नहीं कि मीडिया पहला या चौथा स्तम्भ है, बल्कि यह है कि क्या मीडिया अपनी मूल भूमिका निभा रहा है? क्या वह सत्ता से सवाल पूछ रहा है या सत्ता का साधन बनता जा रहा है?
स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो भारत में मीडिया ने लोकतंत्र की नींव रखने का काम किया है। अगर इतिहास को आधार मानें, तो मीडिया “पहला स्तम्भ” है,वह स्तम्भ जिसने बाकी स्तम्भों को खड़ा होने की जमीन दी।
अगर कलम कमजोर हुई, तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। इसलिए जरूरी है कि मीडिया अपनी ताकत पहचाने वह केवल खबर देने वाला नहीं, बल्कि देश की दिशा तय करने वाला सबसे पहला और सबसे बड़ा स्तम्भ है।
लेखक, यूथ इंडिया मीडिया ग्रुप के संस्थापक और और मुख्य संपादक हैं।
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