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Tuesday, July 7, 2026

क्या हम सचमुच इंसानों की तरह जी रहे हैं?

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— मोहित धवन

सुबह की शुरुआत अलार्म से होती है और रात का अंत थकान के साथ। दिनभर भागदौड़, जिम्मेदारियाँ, नौकरी का दबाव, परिवार की चिंताएँ, आर्थिक आवश्यकताएँ और भविष्य की अनिश्चितता—इन्हीं के बीच जीवन गुजरता चला जाता है। लेकिन दिन के अंत में जब मन स्वयं से प्रश्न करता है, तो एक आवाज़ भीतर से उठती है—क्या यही जीवन है?

यह प्रश्न आज केवल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आधुनिक समाज का सामूहिक प्रश्न बन चुका है। विज्ञान और तकनीक ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं। संचार तेज़ हुआ, साधन बढ़े, जीवन अधिक सुविधाजनक हुआ। फिर भी मानसिक तनाव, पारिवारिक विघटन, अकेलापन और असंतोष लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसा क्यों?

इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास कर रहे हैं मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK) के संस्थापक अजय दायमा। उनका मानना है कि आज की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सही समझ का अभाव है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अजय दायमा ने लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षा उत्तीर्ण कर शासकीय सेवा में प्रवेश किया। लेकिन व्यवस्था के प्रति वैचारिक असहमति और जीवन के गहरे प्रश्नों की तलाश ने उन्हें सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन मानव चेतना, परिवार, समाज और व्यवस्था को समझने तथा समझ विकसित करने के कार्य में समर्पित कर दिया।

उनका चिंतन ए. नागराज द्वारा प्रतिपादित जीवन विद्या (मध्यस्थ दर्शन) से प्रेरित है। यह दर्शन बताता है कि संपूर्ण अस्तित्व सह-अस्तित्व पर आधारित है। प्रकृति का प्रत्येक घटक एक-दूसरे का पूरक है और मनुष्य भी इसी व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल जीविका कमाना या भौतिक सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व को अपने व्यवहार में स्थापित करना है।

अजय दायमा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अत्यंत सरल है—यदि हमारा पूरा जीवन केवल कमाने, उपभोग करने, प्रतिस्पर्धा करने और फिर उसी चक्र को दोहराने में बीत जाए, तो मनुष्य और अन्य जीवों के जीवन में मूल अंतर क्या रह जाएगा?

यह प्रश्न आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना को सामने रखता है। भोजन, सुरक्षा, परिवार और सुविधा आवश्यक हैं, लेकिन यदि जीवन का पूरा उद्देश्य केवल इन्हीं तक सीमित रह जाए तो मनुष्य अपनी सबसे बड़ी विशेषता—समझने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता—को खो देता है।

पशु भी भोजन करते हैं, अपने परिवार की रक्षा करते हैं और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। किंतु मनुष्य को प्रकृति ने एक अतिरिक्त क्षमता दी है—सही और गलत का विवेक, संबंधों को समझने की शक्ति और जीवन के उद्देश्य को जानने की क्षमता। यही विशेषता मनुष्य को केवल जीवित रहने से आगे बढ़ाकर सार्थक जीवन जीने की संभावना देती है।

आज समाज में तनाव सामान्य माना जाने लगा है। परिवारों का टूटना सामान्य लगने लगा है। सफलता का अर्थ केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित होता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा ने सहयोग की जगह ले ली है और उपलब्धियों के बावजूद भीतर का खालीपन बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति बताती है कि बाहरी विकास के साथ आंतरिक विकास नहीं हो पाया।

अजय दायमा का मानना है कि किसी भी समाज का स्थायी परिवर्तन कानूनों, सरकारों या तकनीकी प्रगति से नहीं आता। वास्तविक परिवर्तन तब प्रारंभ होता है जब व्यक्ति स्वयं को समझना शुरू करता है। जब वह अपने संबंधों, अपने दायित्वों और जीवन के उद्देश्य को पहचानता है, तभी परिवार बदलते हैं, समाज बदलता है और अंततः व्यवस्था भी बदलने लगती है।

इसी सोच के आधार पर वे चार मूल आधारों की चर्चा करते हैं—सही शिक्षा, प्रकृति के अनुरूप उत्पादन, शोषण-मुक्त विनिमय और न्यायपूर्ण संबंध। यदि शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित हो जाए, उत्पादन केवल लाभ कमाने का माध्यम बन जाए, व्यापार केवल प्रतिस्पर्धा सिखाए और संबंध केवल स्वार्थ पर आधारित हों, तो समाज आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी मानवीय दृष्टि से कमजोर होता जाएगा।

मानव चेतना विकास केंद्र इन्हीं सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का प्रयास कर रहा है। यहाँ शिक्षा, परिवार, श्रम, उत्पादन और सामाजिक जीवन को अलग-अलग विषय नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन-व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। उद्देश्य केवल विचार देना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देना है जिसमें व्यक्ति स्वयं भी संतुलित रहे और समाज भी स्वस्थ बने।

आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति और अभूतपूर्व तकनीकी बदलावों के दौर से गुजर रही है, तब सबसे बड़ा प्रश्न मशीनों की क्षमता नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना का है। हम लगातार बेहतर मशीनें बना रहे हैं, लेकिन क्या हम बेहतर इंसान भी बन रहे हैं? यही वह प्रश्न है जो अजय दायमा के चिंतन को समकालीन और प्रासंगिक बनाता है।

यह लेख किसी व्यक्ति का महिमामंडन नहीं, बल्कि एक विचार से संवाद का प्रयास है। किसी भी विचार से सहमत या असहमत होना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। किंतु यदि यह लेख पढ़ने के बाद कोई पाठक कुछ क्षण रुककर स्वयं से यह पूछे”क्या मैं केवल जीवन बिता रहा हूँ, या सचमुच इंसानों की तरह जी भी रहा हूँ?”तो शायद यही इस लेख की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।

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