– यूपी पुलिस का अपराध नियंत्रण का नया मॉडल
– 9 साल में 17,043 पुलिस मुठभेड़, 34,253 अपराधी गिरफ्तार,
– 11,834 घायल और 289 की मौत;
विशेष रिपोर्ट | यूथ इंडिया
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जब भी किसी बदमाश के पुलिस मुठभेड़ में पैर में गोली लगने और उसके बाद गिरफ्तारी की खबर आती है, तो सोशल मीडिया पर एक शब्द तेजी से वायरल होता है—”हाफ एनकाउंटर”। यह कोई कानूनी शब्द नहीं है, लेकिन आम बोलचाल में इसका इस्तेमाल उन मामलों के लिए किया जाने लगा है, जिनमें पुलिस कार्रवाई के दौरान आरोपी के पैर में गोली लगने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है।
योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद अपराध और अपराधियों के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति के तहत पुलिस कार्रवाई लगातार चर्चा में रही है। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 से मई 2026 तक प्रदेश में 17,043 पुलिस मुठभेड़ हुईं। इन अभियानों में 34,253 अपराधी गिरफ्तार, 11,834 घायल हुए, जबकि 289 अपराधियों की मौत हुई। इन कार्रवाइयों में 18 पुलिसकर्मी शहीद और 1,852 पुलिसकर्मी घायल भी हुए।
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि मुठभेड़ों में मारे गए अपराधियों की तुलना में घायल होकर गिरफ्तार होने वालों की संख्या कई गुना अधिक है। यही वजह है कि “हाफ एनकाउंटर” शब्द चर्चा का विषय बन गया है।
उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि जब कोई आरोपी पुलिस पर फायरिंग करता है और भागने की कोशिश करता है, तब आत्मरक्षा और गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए जवाबी कार्रवाई की जाती है। पुलिस का दावा है कि यदि संभव हो तो आरोपी को जीवित गिरफ्तार करना प्राथमिकता होती है। इसी कारण कई मामलों में गोली पैर में लगने की घटनाएं सामने आती हैं।
दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि हर पुलिस मुठभेड़ की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। उनका तर्क है कि कानून के शासन में किसी भी कार्रवाई की पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) भी हर मुठभेड़ के बाद निर्धारित प्रक्रिया के पालन पर जोर देते रहे हैं।
सरकार का दावा है कि सख्त पुलिस कार्रवाई के कारण संगठित अपराध, रंगदारी और माफिया नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगा है। कई बड़े अपराधी या तो गिरफ्तार हुए, राज्य छोड़कर चले गए या उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति जब्ती और एनएसए जैसी कानूनी कार्रवाई की गई।
यूपी में “हाफ एनकाउंटर” आज केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि कानून, अपराध नियंत्रण और मानवाधिकार के बीच चल रही बहस का विषय बन चुका है। एक पक्ष इसे अपराधियों में भय पैदा करने वाली प्रभावी रणनीति मानता है, तो दूसरा पक्ष हर मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग करता है।
सवाल यही है कि क्या “हाफ एनकाउंटर” अपराध नियंत्रण का नया मॉडल है, या फिर इसे लेकर उठ रहे सवालों का जवाब जांच और अदालतों को देना होगा? आने वाले समय में यही बहस तय करेगी कि उत्तर प्रदेश का यह मॉडल केवल पुलिसिंग की रणनीति रहेगा या न्यायिक विमर्श का भी बड़ा विषय बनेगा।


