35 C
Lucknow
Monday, May 11, 2026

संघर्ष से सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक यूँ ही नहीं पहुंचे अमित शाह

Must read

– समाज की वेवफाई और परिवार का अपमान भी सहा

– महज 10 वर्षों में बदल डाली देश की राजनीति

– और बनी मोदी शाह की अमर ऐतिहासिक जोड़ी

शरद कटियार

भारत की राजनीति में कुछ नाम केवल नेता नहीं बनते, बल्कि राजनीतिक रणनीति, संगठन क्षमता और संघर्ष की मिसाल बन जाते हैं। भारत के वर्तमान चाणक्यअमित शाह ऐसा ही एक अमर नाम हैं। आज उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे मजबूत रणनीतिकार कहा जाता है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। यह कहानी है एक ऐसे कार्यकर्ता की, जिसने संगठन के छोटे स्तर से शुरुआत कर देश की सत्ता के केंद्र तक पहुंचने का रास्ता बनाया।

साधारण परिवार से राजनीति की शुरुआत

अमित शाह का जन्म 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में एक गुजराती परिवार में हुआ। बाद में उनका परिवार गुजरात के अहमदाबाद से जुड़ गया। उनके पिता पीवीसी पाइप का व्यवसाय करते थे। बचपन से ही अमित शाह का झुकाव राष्ट्रीय विचारधारा और संगठनात्मक गतिविधियों की ओर था।

उन्होंने बायोकेमिस्ट्री से पढ़ाई की, लेकिन कॉलेज के दिनों में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। यहीं से उनकी राजनीतिक और वैचारिक यात्रा की नींव पड़ी।

आरएसएस और भाजपा में जमीनी कार्यकर्ता के रूप में संघर्ष

अमित शाह ने राजनीति में किसी बड़े परिवार या विरासत के सहारे प्रवेश नहीं किया। उन्होंने पोस्टर लगाने, बूथ प्रबंधन करने और संगठन के छोटे-छोटे कार्यों से शुरुआत की। उस दौर में भाजपा गुजरात में बहुत मजबूत नहीं थी। कांग्रेस का दबदबा था और भाजपा के कार्यकर्ताओं को लगातार संघर्ष करना पड़ता था।उस दौर में

युवा अमित शाह को संगठन की गहराई से समझने का मौका मिला। वह कार्यकर्ताओं के बीच रहकर राजनीति सीखते रहे, उन्होंने परिवार, दोस्तों, सजातियों रिश्तेदारों से दूरी बनाई और अपने मुख्य मिशन पर काम किया,यही कारण है कि बाद में आज उन्हें “माइक्रो मैनेजमेंट” का मास्टर कहा जाने लगा। यह संघर्ष बहुत लंबा नहीं है महज वर्ष 1990 से और आज तक का है।

नरेंद्र मोदी से मुलाकात और राजनीतिक दिशा

गुजरात भाजपा और आरएसएस में काम करते हुए अमित शाह की मुलाकात नरेंद्र मोदी से हुई। यह राजनीतिक संबंध आगे चलकर भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली जोड़ी में बदल गया।

मोदी और शाह दोनों संगठनात्मक राजनीति को समझते थे। दोनों ने गुजरात में भाजपा को मजबूत करने के लिए बूथ स्तर पर व्यापक नेटवर्क तैयार किया। अमित शाह ने चुनावी गणित, जातीय समीकरण और संगठनात्मक संरचना पर गहरी पकड़ बनाई।

गुजरात की राजनीति में उभार

1990 के दशक में अमित शाह का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। उन्होंने सहकारी संस्थाओं, स्थानीय निकायों और संगठन में लगातार काम किया। 1997 में वे पहली बार विधायक बने।

इसके बाद उन्होंने गुजरात में भाजपा संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कहा जाता है कि अमित शाह चुनाव को केवल भाषणों से नहीं बल्कि बूथ, डेटा और रणनीति के स्तर पर लड़ते थे।

सबसे कठिन दौर : आरोप, जेल और राजनीतिक हमला

अमित शाह के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर तब आया जब उन पर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले समेत कई आरोप लगे। उन्हें जेल भी जाना पड़ा और कुछ समय के लिए गुजरात छोड़ने का आदेश दिया गया।

उस समय विपक्ष लगातार उन पर हमला कर रहा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि शायद अमित शाह का राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा। लेकिन यही वह दौर था जिसने उनके संघर्ष को और मजबूत बना दिया। उन्होंने जेल की चाहर दिवारी में बैठकर किताबों का अध्ययन किया इसके बाद लगातार 2 साल तक दिल्ली में गुजरात हाउस के कमरे में खुद को सीमित कर मैनेजमेंट पर काम किया।

उन्होंने हार नहीं मानी। कानूनी लड़ाई लड़ी और धीरे-धीरे राजनीति में वापसी की। बाद में अदालत से उन्हें राहत मिली और वे फिर सक्रिय राजनीति में लौटे।

2014 : जिसने भारतीय राजनीति बदल दी

2014 लोकसभा चुनाव अमित शाह के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया। उस समय यूपी में भाजपा की स्थिति बहुत मजबूत नहीं मानी जा रही थी।

अमित शाह ने बूथ स्तर पर संगठन को नए तरीके से खड़ा किया। जातीय समीकरणों, कार्यकर्ता नेटवर्क और माइक्रो प्लानिंग के जरिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत हासिल की।

इस जीत के बाद अमित शाह राष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार बनकर उभरे।

भाजपा अध्यक्ष के रूप में रिकॉर्ड

2014 में अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में भाजपा ने कई राज्यों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उन्होंने पार्टी को केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि पूर्वोत्तर, बंगाल और दक्षिण भारत तक विस्तार की रणनीति बनाई।

उनके कार्यकाल में भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने का दावा करने लगी। सदस्यता अभियान और बूथ संरचना को उन्होंने नई ताकत दी।

गृह मंत्री के रूप में बड़ा प्रभाव

2019 में नरेंद्र मोदी सरकार की वापसी के बाद अमित शाह देश के गृह मंत्री बने। इस दौरान उन्होंने कई बड़े फैसले लिए,जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए ),राष्ट्रीय सुरक्षा पर सख्त नीति,नक्सल और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई,सीमाई सुरक्षा मजबूत करना,इन फैसलों ने उन्हें भाजपा समर्थकों के बीच “मजबूत निर्णय लेने वाले नेता” की छवि दी, जबकि विपक्ष ने कई मुद्दों पर उनका तीखा विरोध भी किया।

राजनीतिक शैली : क्यों अलग हैं अमित शाह?

अमित शाह को भाषणों से ज्यादा संगठन और रणनीति का नेता माना जाता है।उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है,बूथ स्तर की राजनीति की समझ,

कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद,

चुनावी गणित पर पकड़,

संकट में आक्रामक रणनीति,

लंबे समय तक संगठनात्मक धैर्य।

उनके करीबी बताते हैं कि अमित शाह बेहद अनुशासित कार्यशैली में विश्वास रखते हैं और चुनाव को युद्ध की तरह तैयार करते हैं।

आलोचना और विवाद भी रहे साथ

अमित शाह का राजनीतिक सफर केवल सफलता की कहानी नहीं रहा। उन पर विपक्ष लगातार एजेंसियों के इस्तेमाल, आक्रामक राजनीति और ध्रुवीकरण के आरोप लगाता रहा है। लेकिन समर्थकों का कहना है कि उन्होंने भाजपा को संगठनात्मक रूप से सबसे मजबूत दौर में पहुंचाया।

संघर्ष से सत्ता तक

अमित शाह की कहानी भारतीय राजनीति में उस संघर्ष का उदाहरण है जहां एक साधारण कार्यकर्ता लगातार संगठन में काम करते हुए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता है।

उनकी यात्रा यह भी दिखाती है कि आधुनिक राजनीति केवल भाषणों से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति, धैर्य और निरंतर संघर्ष से बनती है।

आज अमित शाह भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राजनीतिक ताकत रातोंरात नहीं बनती , उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, विवाद, हार, वापसी और लगातार मेहनत छिपी होती है।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article