नई दिल्ली: राजनीति में कब पासा पलट जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर मचे घमासान ने देश की सियासत को गरमा दिया है। आम आदमी पार्टी में Raghav Chaddha की अगुवाई में हुई बगावत ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। 7 राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद केजरीवाल ने इसे गंभीर चुनौती के रूप में लिया है। पार्टी अब राज्यसभा चेयरमैन और देश के उपराष्ट्रपति से शिकायत कर बागियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही है।
पार्टी ने सभापति से मांग की है कि जल्द से जल्द कार्यवाही करके न्यायपूर्ण फैसला दें। AAP के ये सातों सांसद हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा के सभापति से 7 सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की है। इसे लेकर AAP ने सभापति और देश के उपराष्ट्रपति से शिकायत की है।
दरअसल, 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी से बगावत कर बीजेपी में शामिल हुए 7 सांसदों के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने कार्रवाई शुरू कर दी है। आम आदमी पार्टी ने सातों बागी सांसदों के खिलाफ सदस्यता रद्द करने की शिकायत राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन को भेज दी है।
AAP के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि पार्टी ने संवैधानिक विशेषज्ञों से सलाह ली है। इनमें वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सांसद कानून के तहत अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन से 7 सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की है। AAP के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति को एक शिकायत भेजी है जिसमें संविधान की 10 वी अनुसूची के मुताबिक सातों सदस्यों की सदस्यता खत्म करने के लिए अनुरोध किया है।
संजय सिंह ने कहा कि दसवीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन कानून) के तहत ऐसे दलबदल मान्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इन सांसदों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि लीडरशिप को दलबदल की आशंका थी और आखिरी वक्त में कुछ सांसदों को रोकने की कोशिश भी की गई थी लेकिन पार्टी नेताओं की काफी कोशिशों के बाद भी सातों राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने कहा कि ऐसे सांसद अयोग्य ठहराए जा सकते हैं। सिब्बल के मुताबिक, संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत सांसदों का अलग होना और किसी दूसरी पार्टी में मिलना सिर्फ संख्या के खेल पर निर्भर नहीं है। इसके लिए पहले मूल राजनीतिक दल के स्तर पर विलय का औपचारिक प्रस्ताव होना अनिवार्य है। यही कानूनी पेच अब AAP के लिए उम्मीद का रास्ता बन सकता है।


