– अब बिजली बिल और स्मार्ट मीटर ने बढ़ाई मुसीबत
– सीएम से कर्ज माफी और कनेक्शन कटौती पर रोक की मांग
फर्रुखाबाद/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आलू किसानों की हालत लगातार बदतर होती जा रही है। बाजार में आलू के दाम औंधे मुंह गिरने से किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही, वहीं बिजली बिलों का बोझ उनकी कमर तोड़ रहा है। इस गंभीर संकट को लेकर आलू विकास विपणन सहकारी संघ के निदेशक अशोक कटियार ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
पत्र में साफ कहा गया है कि प्रदेश का आलू किसान इस समय “आर्थिक आपदा” से गुजर रहा है। पिछले सीजन में आलू की लागत जहां प्रति कुंतल 900 से 1100 रुपये तक पहुंची, वहीं बाजार में कई जगह किसानों को 500–700 रुपये प्रति कुंतल तक ही दाम मिले। इससे किसानों पर कर्ज का दबाव तेजी से बढ़ा है।
सबसे बड़ा मुद्दा बिजली बिल और स्मार्ट मीटर को लेकर सामने आया है। आरोप है कि जिन उपभोक्ताओं के यहां जबरन स्मार्ट मीटर लगाए गए, उनके बिल असामान्य रूप से बढ़ गए हैं। कई मामलों में पहले जहां 1000–1500 रुपये मासिक बिल आता था, वह अब 3000–5000 रुपये तक पहुंच गया है। इससे ग्रामीण और किसान उपभोक्ताओं में भारी नाराजगी है।
पत्र में यह भी उजागर किया गया है कि सरकार ने फिलहाल स्मार्ट मीटर लगाने पर रोक लगा दी है, लेकिन जिन उपभोक्ताओं के यहां पहले से मीटर लगाए जा चुके हैं, उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा। ऐसे में मांग उठाई गई है कि प्रत्येक जिले में विशेष शिविर लगाकर उपभोक्ताओं की शिकायतों का तत्काल निस्तारण किया जाए।
मामले का दूसरा बड़ा पहलू बिजली विभाग की कार्रवाई है। भीषण गर्मी के बीच बकाया बिलों को लेकर किसानों और आम उपभोक्ताओं के बिजली कनेक्शन काटे जा रहे हैं। इसे “अमानवीय और किसान विरोधी कदम” बताते हुए मांग की गई है कि गर्मी के मौसम में कनेक्शन कटौती पर तत्काल रोक लगाई जाए।
मुख्य मांगों में शामिल हैं कि बकायेदार आलू किसानों के बिजली बिल माफ किए जाएं
स्मार्ट मीटर से जुड़े विवादों के समाधान के लिए विशेष शिविर लगाए जाएं,
भीषण गर्मी में बिजली कनेक्शन काटने पर रोक लगे,
बिजली बिल छूट योजना को जून तक बढ़ाया जाए।
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश में लाखों किसान सीधे तौर पर आलू उत्पादन से जुड़े हैं, और इनमें से बड़ी संख्या इस समय कर्ज और लागत के दबाव में है। यदि जल्द राहत नहीं दी गई तो यह संकट बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
युवा वर्ग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर साफ दिख रहा है खेती से मोहभंग बढ़ रहा है और रोजगार के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। अब सबकी नजर मुख्यमंत्री के फैसले पर टिकी है कि क्या सरकार इस संकट को “आपदा” मानते हुए त्वरित राहत देगी या फिर किसान इसी तरह संघर्ष करते रहेंगे।
आलू किसानों पर दोहरी मार: मंदी से टूटी कमर


