– जानलेवा हमले के बाद पीड़ित को ही बनाया गया समझौते के लिए मजबूर
फर्रुखाबाद। जिले में कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ एक युवक ने न केवल अपने ऊपर हुए जानलेवा हमले का आरोप लगाया है, बल्कि पुलिस पर भी मिलीभगत कर उसे जबरन समझौता करने के लिए मजबूर करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। पीड़ित अभिषेक सिंह, निवासी महावीर गंज, ने पूरे घटनाक्रम को विस्तार से बताते हुए पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाई है।
घटना की शुरुआत 19 अप्रैल 2026 को एक साधारण सोशल मीडिया गतिविधि से हुई, जो देखते ही देखते एक आपराधिक साजिश में बदल गई। अभिषेक के अनुसार, उन्होंने अपनी एक क्लासमेट को सोशल मीडिया पर रिक्वेस्ट भेजी थी। लेकिन उस आईडी का संचालन कथित तौर पर उसके बॉयफ्रेंड अन्नू वर्मा निवासी तलैया फजल इमाम के हाथ में था। आरोप है कि अन्नू वर्मा ने अवैध तरीके से अभिषेक का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और व्हाट्सऐप कॉल के जरिए उसे जान से मारने, हाथ-पैर तोड़ने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ दीं।
मामला यहीं नहीं रुका। पीड़ित का आरोप है कि कुछ ही समय बाद अन्नू वर्मा अपने साथियों—आशु वर्मा, आयुष कनौजिया (पट्टू), अंशुल प्रताप सिंह (नोड़ी) और अन्य 7-8 अज्ञात लोगों के साथ मदारवादी चौराहे पर उसे घेर लिया। वहाँ उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई। लात-घूंसों से किए गए इस हमले को पीड़ित ने स्पष्ट रूप से जानलेवा बताते हुए भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के तहत अपराध करार दिया है।
हालांकि, सबसे गंभीर और चिंताजनक आरोप पुलिस की भूमिका को लेकर सामने आया है। अभिषेक का कहना है कि घटना के बाद उन्होंने कोतवाली में तैनात सिपाही ‘ईशू’ से संपर्क किया और अपनी शिकायत की कॉपी मांगी। सिपाही ने उन्हें थाने बुलाया और भरोसा दिलाया कि उनकी इच्छा के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। लेकिन जब अभिषेक थाने पहुँचे, तो वहाँ का नजारा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था।
पीड़ित के अनुसार, थाने में पहले से ही आरोपी पक्ष के लोग मौजूद थे। वहाँ ‘दुर्गेश दिवाकर’ नामक व्यक्ति खुद को मध्यस्थ बताकर सामने आया, लेकिन आरोप है कि वह भी हमलावरों के साथ मिलकर अभिषेक पर दबाव बना रहा था। पुलिस की मौजूदगी में ही अभिषेक को घेरकर धमकाया गया कि यदि उसने समझौता नहीं किया तो उसे धारा 151 में जेल भेज दिया जाएगा और उस लड़की के जरिए उसके खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अभिषेक का दावा है कि भारी दबाव और जान के खतरे को देखते हुए उसे मजबूरन समझौता करना पड़ा। लेकिन अपनी सुरक्षा और भविष्य के सबूत के तौर पर उसने उस समझौता पत्र पर जानबूझकर फर्जी हस्ताक्षर किए, ताकि यह साबित किया जा सके कि यह समझौता उसकी स्वेच्छा से नहीं बल्कि दबाव में कराया गया था।
मामले को और भी गंभीर बनाता है वह ऑडियो रिकॉर्डिंग, जो पीड़ित के पास मौजूद है। इस रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर सिपाही द्वारा दिए गए आश्वासन और बाद में हुए विश्वासघात के संकेत मिलते हैं। यह सबूत न केवल पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाता है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर भी चिंता पैदा करता है।
पीड़ित ने पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि सभी आरोपियों के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जाए और संबंधित सिपाही की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।


