– राजनीति में टूट की आहट को हल्के में नहीं लिया जा सकता
शरद कटियार
बलिया की धरती को यूं ही “बागी बलिया” नहीं कहा जाता। यह वही भूमि है जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देकर इतिहास रचा था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का संसदीय क्षेत्र रहा बलिया राजनीतिक चेतना, विद्रोह और सत्ता को आईना दिखाने की परंपरा के लिए जाना जाता है। ऐसे में जब समाजवादी पार्टी में टूट और असंतोष की चर्चाएं उठती हैं तो सबसे ज्यादा नजरें पूर्वांचल, विशेषकर बलिया पर टिक जाती हैं।
हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के भीतर टूट की अटकलों को लेकर सपा सांसद Sanatan Pandey को सफाई देनी पड़ी। राजनीति में अक्सर सफाई वहीं दी जाती है जहां सवाल खड़े होने लगते हैं। यह जरूरी नहीं कि हर अफवाह सच हो, लेकिन यह भी सच है कि बिना धुएं के आग की चर्चा लंबे समय तक नहीं चलती।
समाजवादी पार्टी आज उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत है। उसके पास लोकसभा में उल्लेखनीय उपस्थिति है और विधानसभा में भी मजबूत आधार है। लेकिन इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दलों को विपक्ष नहीं, अक्सर अंदरूनी असंतोष ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। कभी सपा के बड़े चेहरों में गिने जाने वाले मनोज कुमार पाण्डेय का पार्टी छोड़ना और बाद में सत्ता पक्ष में महत्वपूर्ण स्थान पाना इसका उदाहरण माना जाता है। राजनीति में व्यक्ति केवल पार्टी नहीं बदलता, वह अपने साथ समीकरण, समर्थक और प्रभाव भी ले जाता है।
देश की राजनीति में टूट की घटनाएं नई नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में कई बार दल-बदल ने राजनीतिक संतुलन बदला। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत ने वर्षों पुरानी राजनीतिक संरचना को बदल दिया। शिवसेना का विभाजन इस बात का उदाहरण है कि जब असंतोष संगठन के भीतर आकार लेता है तो बड़े से बड़ा दल भी चुनौती में पड़ सकता है।
समाजवादी पार्टी के लिए असली सवाल यह नहीं है कि कितने सांसद या विधायक टूटेंगे। सवाल यह है कि क्या पार्टी के भीतर संवाद, संतुलन और नेतृत्व पर भरोसा पूरी तरह कायम है? यदि सब कुछ सामान्य है तो बार-बार उठ रही चर्चाएं क्यों जन्म ले रही हैं? और यदि चर्चाएं निराधार हैं तो उन्हें इतनी तेजी से हवा कौन दे रहा है?
राजनीति का एक कठोर सत्य यह भी है कि सत्ता के गलियारों में स्थायी मित्रता नहीं होती। यहां कई बार साया भी साथ छोड़ देता है। जब तक राजनीतिक लाभ साथ हो, लोग साथ दिखाई देते हैं; जैसे ही परिस्थितियां बदलती हैं, समीकरण भी बदल जाते हैं।
फिलहाल समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती विपक्ष से अधिक अपने संगठन को एकजुट बनाए रखने की है। सांसदों और विधायकों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है कार्यकर्ताओं का मनोबल और नेतृत्व पर भरोसा। बलिया की बागी धरती से उठ रही फुसफुसाहटें भले अभी बगावत में न बदली हों, लेकिन राजनीति के जानकार जानते हैं कि चिंगारी को नजरअंदाज करना हमेशा महंगा पड़ता है।
आज सवाल यह नहीं कि सपा टूट रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या पार्टी नेतृत्व उन संकेतों को पढ़ पा रहा है जो राजनीति की सतह के नीचे धीरे-धीरे आकार ले रहे हैं। इतिहास बताता है कि राजनीतिक दल बाहर से नहीं, भीतर से कमजोर होते हैं। और जब भीतर दरार पड़ती है, तो सबसे पहले आवाज उन्हीं दीवारों से आती है जिन्हें सबसे मजबूत माना जाता है।


