अक्षत सक्सेना
देश में जब भी किसी बड़ी परीक्षा, भर्ती या शिक्षा व्यवस्था को लेकर विवाद होता है, तब सबसे अधिक प्रभावित छात्र होते हैं। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता या प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय होना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होना लोकतंत्र की बुनियादी अपेक्षा है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या किसी मंत्री का इस्तीफा ही आंदोलन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए? और यदि ऐसा हो भी जाए, तो क्या आंदोलन का उद्देश्य पूरा मान लिया जाना चाहिए, या फिर उसे राजनीतिक रूप देकर लगातार नए लक्ष्यों की ओर मोड़ देना उचित है?
हाल के समय में देखा गया कि छात्रों के एक आंदोलन को धीरे-धीरे विभिन्न राजनीतिक दलों का समर्थन मिलने लगा। इसके बाद आंदोलन का केंद्र केवल परीक्षा या शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति, प्रधानमंत्री, सरकार और अन्य राजनीतिक मुद्दों तक पहुँच गया। ऐसे में मूल प्रश्न छात्रों के भविष्य, परीक्षा की निष्पक्षता और शिक्षा सुधार,कई बार पीछे छूटते दिखाई दिए।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। शांतिपूर्ण धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और न्याय की माँग लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति हैं। लेकिन जब विरोध की भाषा में व्यक्तिगत अपमान, अशोभनीय टिप्पणियाँ, गाली-गलौज, हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसी प्रवृत्तियाँ शामिल हो जाती हैं, तब आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खोने लगता है।
विशेष रूप से सोशल मीडिया के दौर में यह चुनौती और बढ़ गई है। अनेक मंचों पर ऐसे वीडियो और संदेश प्रसारित हुए जिनमें भाषा की मर्यादा का अभाव दिखाई दिया। किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति चाहे वह प्रधानमंत्री हों, मंत्री हों या विपक्ष के नेता,के प्रति असहमति व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान और अभद्र भाषा स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा नहीं मानी जा सकती।
छात्रों को यह समझना होगा कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी नैतिक विश्वसनीयता है। यदि आंदोलन तथ्यों, अनुशासन और सकारात्मक माँगों पर आधारित रहेगा तो समाज का व्यापक समर्थन उसे मिलेगा। लेकिन यदि आंदोलन का स्वरूप राजनीतिक टकराव, कटु भाषा या हिंसक व्यवहार में बदल जाता है, तो उसके मूल उद्देश्य को नुकसान पहुँच सकता है।
दूसरी ओर सरकार की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। सरकार को परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, समयबद्ध जाँच, दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड, पारदर्शी जाँच प्रक्रिया और छात्रों के साथ नियमित संवाद स्थापित करना होगा। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास तभी लौटेगा जब सुधार केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर धरातल पर दिखाई देंगे।
यदि किसी मंत्री के स्तर पर जवाबदेही तय होती है, तो उसके बाद सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। साथ ही छात्रों को भी यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि उनकी मेहनत और भविष्य सुरक्षित है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आंदोलन समाप्त कर देना चाहिए?यदि आंदोलन की प्रमुख माँगों पर ठोस कार्रवाई शुरू हो चुकी है, जाँच निष्पक्ष रूप से चल रही है और सुधार की दिशा स्पष्ट दिखाई दे रही है, तो छात्रों को आंदोलन के स्वरूप पर पुनर्विचार करना चाहिए। लोकतंत्र में आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, न कि अनिश्चितकाल तक टकराव बनाए रखना। वहीं यदि छात्रों की मूल माँगें अभी भी अधूरी हैं, तो वे शांतिपूर्ण, संवैधानिक और मर्यादित तरीके से अपनी बात आगे भी रख सकते हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है, टकराव नहीं। सरकार और छात्रों,दोनों की जिम्मेदारी है कि वे समाधान की दिशा में आगे बढ़ें। शिक्षा का भविष्य किसी भी राजनीतिक मतभेद से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए आवश्यक है कि आंदोलन का केंद्र छात्रों का हित, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता बना रहे।
(लेखक पूर्व मे पत्रकार रह चुके है और वर्तमान मे मल्टीनेशनल कंपनी मे बतौर कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट के तौर पर कार्यरत है।)


