— शरद कटियार
कन्नौज, जो इत्र की खुशबू के लिए जाना जाता है, इन दिनों सियासत की तीखी गंध से भरा हुआ है। भाजपा के पूर्व सांसद सुब्रत पाठक और प्रदेश सरकार के मंत्री असीम अरुण के प्रति चल रही अंदरूनी खींचतान अब सतह पर आ चुकी है। जो बातें अब तक बंद कमरों में फुसफुसाहट थीं, वे अब मंचों और मीडिया में गूंजनें लग गयीं ।
पूर्व सांसद कन्नौज लोकसभा और भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत पाठक का ताजा बयान महज एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि लंबे समय से जमा राजनीतिक असंतोष का विस्फोट है। उन्होंने सवाल उठाया, कि जब उनके खिलाफ 2023 में मुकदमा दर्ज हुआ, तब सत्ता के जिम्मेदार चेहरे खामोश क्यों थे? क्या यह खामोशी संयोग थी या सुनियोजित दूरी? यह सवाल सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें अपने ही लोग एक-दूसरे के लिए ‘पराये’ हो जाते हैं।
सच यह भी है कि उस प्रकरण में पाठक की भूमिका पर सवाल उठे थे—पुलिस चौकी में घुसकर हंगामा और दारोगा से कथित मारपीट जैसे आरोप हल्के नहीं थे। लेकिन राजनीति में आरोप और अवसर साथ-साथ चलते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कौन कब, किस मंच से और किस मंशा से उन्हें उठाता है। हालांकि मंत्री असीम अरुण आईपीएस अधिकारी रहे हैं उन्होंने कभी भी गुंडागर्दी को बढ़ावा खाकी से लैस होते नहीं दिया सुब्रत की पुलिस चौकी में घुसकर दरोगा और पुलिस कर्मियों संग की गई मारपीट और खुलेआम गुंडागर्दी के मामले में भी मंत्री असीम अरुण ने सब कुछ कानून पर छोड़ मुंह बंद रखा था क्योंकि मामला उनकी पार्टी और पार्टी के वरिष्ठ नेता से जुड़ा था।
इशारों में ही सही, इसी घटना को लेकर सुब्रत ने मंत्री असीम अरुण पर निशाना साधा । यह निशाना सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस बदलते राजनीतिक संतुलन पर है जिसमें कन्नौज की सियासत नई दिशा ले रही है। एक समय जो क्षेत्र पूरी तरह पारंपरिक सियासी समीकरणों पर चलता था, वहां अब सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं—और यही बदलाव शायद कुछ नेताओं को असहज कर रहा है। मंत्री असीम अरुण की कन्नौज में दखलअंदा जी के बाद यहां दलित और पिछड़े समुदाय पर होते रहे अत्याचारों पर विराम लगा।लोगों पर झूठे मुकदमे दर्ज होने बंद हुए, यहां की बेटियों और महिलाओं की कीमती जमीनों पर अवैध कब्जे होने बंद हुए एक दशक बाद कन्नौज की सियासत पारंपरिक भाईचारे और अपने पुराने स्वरूप में वापस लौटी, यह दबंग प्रवृत्ति के लोगों को कतई रास नहीं आया और इससे भी ज्यादा भूसूर प्रवृत्ति के लोग अपनी गंदी राजनीति के उखड़ते पॉव देख बिलबिला उठे।
साफ शब्दों में कहें तो कन्नौज में उभरती दलित और ओबीसी राजनीति और उसका प्रभाव, पुरानें सियासतगीरों के लिए चुनौती बनता दिखनें लगा । यह कहना गलत नहीं होगा कि सुब्रत पाठक को यह बदलता समीकरण सहजता से स्वीकार नहीं हो पा रहा। वहीं असीम अरुण की राजनीति, जो प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक संतुलन के साथ आगे बढ़ रही है, उस पर भी अब सीधे-सीधे प्रहार हो रहे हैं।
हाल ही में जिलाधिकारी और मंत्री के बीच हुए विवाद ने भी इस आग में घी का काम किया। सत्ता के भीतर शक्ति प्रदर्शन और अहंकार की टकराहट अब छुपी नहीं रही। यह भी चर्चा में है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सिर्फ प्रशासनिक असहमति नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक रणनीति काम कर रही थी, जिसके पीछे कहीं ना कहीं पूर्व सांसद सुब्रत पाठक का योगदान रहा, जो सुब्रत की चुप्पी खुलने के बाद खुद सामने आ गया।
भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी कई सवाल खड़े करती है। क्या यह व्यक्तिगत अहंकार का टकराव है या फिर आने वाले चुनावों से पहले जमीन तैयार करने की कोशिश? क्या यह संदेश है कि अब पार्टी के भीतर भी अलग-अलग धड़े खुलकर सामने आएंगे?
कन्नौज की सियासत इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां पुरानी पकड़ और नई पैठ के बीच संघर्ष साफ दिखाई दे रहा है। यह टकराव सिर्फ दो नेताओं का नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों का प्रतीक है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह लड़ाई बयानबाजी तक सीमित रहती है या फिर संगठनात्मक स्तर पर भी इसके असर दिखाई देते हैं। फिलहाल इतना तय है कन्नौज की खुशबू में अब सियासी तल्खी घुल चुकी है, और यह तल्खी जल्द खत्म होती नहीं दिख रही। जिसका सीधा फायदा आगामी विधानसभा में यहां से सांसद और सपा सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश अखिलेश यादव को पूर्व की भांति मिलना तय है।
खामोशी टूटी, उबल पड़ी सियासत : कन्नौज की खुशबू में घुली ऊच -नीच की कड़वाहट


