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Friday, March 20, 2026

बदलता मौसम जीवसृष्टी के लिए बेहद खतरनाक

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(विश्व मौसम विज्ञान दिवस विशेष 23 मार्च 2026)

पूरी दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग से त्रस्त है, क्योंकि इसका बुरा असर पर्यावरण के प्रत्येक घटक पर हो रहा है और मानवीय जीवन बेहद प्रभावित हुआ है, जबकि इस भयावह परिस्थिति का जिम्मेदार मनुष्य स्वयं हैं। मनुष्य ने अपने लालच, स्वार्थ और गैरजिम्मेदाराना हरकत से समस्त जीवसृष्टी को संकट में डाल दिया है, सभी ओर समस्याओं का अंबार लगा हुआ नजर आता हैं।

मौसम का चक्र ऋतु अनुसार परिवर्तनशील चलता रहता है, परंतु लगातार मानवीय हस्तक्षेप से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता ही जा रहा है, जिस कारण मौसम में हमेशा बदलाव नजर आता हैं। कभी गर्मी में बारिश होती है, बारिश में ठंडी, ठंडी में बारिश, तो कभी बारिश में गर्मी होती है, वातावरण में लगातार बढ़ती आर्द्रता से जान घबराती हैं। कहीं बाढ़ तो कहीं अकाल पड़ जाता हैं। ऐसे अचानक मौसम में बदलाव से मानवी शरीर और फसलों, खाद्यपदार्थों पर बेहद बुरा असर होता हैं।

शुद्ध वातावरण की देश में वैसे ही कमी होती है, हर ओर प्रदूषण, अशुद्ध हवा-पानी, खाद्यपदार्थों में घातक रसायनों का प्रयोग, मिलावटखोरी, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जंगल कटाई, उपजाऊ भूमि का ह्रास, यांत्रिक संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता, हानिकारक गैसों का लगातार उत्सर्जन, खराब उत्पादों की बाजार में व्यापकता और घातक कचरे के बढ़ते पहाड़ ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं।

पहले के मुकाबले आज लोगों की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या तेजी से बढ़ती नजर आती है, मौसम में हल्का सा बदलाव होते ही लोगों में वायरल फैल जाता है, जल्द बीमारी जकड़ लेती है, नयी-नयी जानलेवा बीमारियों ने जन्म ले लिया है, मनुष्य की रोग प्रतिकारक क्षमता कम समय में ही कमजोर पड़ जाती हैं। इस बदलते मौसम के दुष्प्रभाव के कारण मनुष्यों के साथ-साथ असंख्य वन्य जीव, जलचर, जीवजंतु असमय जान गंवाते हैं।

हर साल 23 मार्च को “विश्व मौसम विज्ञान दिवस” जनजागरूकता के लिए पुरे विश्व में मनाया जाता हैं। इस वर्ष की थीम है “आज निरिक्षण, कल की सुरक्षा”। लगातार बदलते मौसम की सटीक जानकारी प्राप्त करना बेहद महत्वपूर्ण है, ताकि उस आंकलन पर विकास और सुरक्षा हेतु योग्य प्रारूप तैयार किया जा सकें। आपदाओं के खतरे को कम करके भविष्य के लिए दॄढ विकास हम प्राप्त कर सकते हैं। अभी मार्च में शुरू हुई तेज गर्मी सामान्य से 4-8 सेल्सियस ज़्यादा तापमान हैं।

हमारे देश में असंतुलित मौसम लगातार अपने नवनवीन रिकॉर्ड बना रहा है, जो दशकों के अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहा हैं। गर्मी में अत्यधिक गर्मी, ठंड में अत्यधिक ठंडी और बारिश के मौसम में बाढ़ की भयावह स्थिति हर ओर नजर आती हैं। इस कारण देश में अक्सर बीमारियों का साम्राज्य फला-फूला रहता हैं। लगातार बदलते मौसम से लोगों की सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है। 2025 की शुरुआत में खराब मौसम की घटनाओं से होने वाली मौतों में पिछले सालों के मुकाबले 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

बढ़ते तापमान से ओजोन परत को बहुत नुकसान हो रहा है, जिससे सांस के विकार अधिक गंभीर हो रहे हैं। हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और दिल की बीमारियां बेतहाशा बढ़ रही हैं। उष्ण लहरों का बढ़ना, कीड़ों से होने वाली बीमारियों का बढ़ना, बाढ़ के कारण पानी से होने वाले इंफेक्शन, डायरिया, हैजा, मलेरिया, डेंगू और अशुद्ध ऑक्सीजन शामिल हैं, इसका सबसे ज्यादा बुरा असर आर्थिक रूप से कमजोर तबके पर बहुत ज़्यादा पड़ता है, जो अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी-रोजी के जुगाड़ में संघर्ष करते रहते हैं।

समुद्री तटीय राज्यों में अक्सर बाढ़, साइक्लोन और हीट वेव का खतरा ज्यादा रहता हैं। मौसम की खराबियों और बार-बार फसल खराब होने के कारण संबंधित व्यवसायिकों या किसानों को मानसिक समस्या जैसे चिंता, नैराश्य और आघातोत्तर तणाव विकार हो सकता हैं। हमारे देश में किसानों को बेहद परिश्रम करने के बाद, प्रकृति की मार झेलने बाद भी योग्य फल या मुआवजा नहीं मिलता, इसलिए किसान आत्महत्या की घटनाएं अत्यधिक घटती हैं।

पल-पल बदलता मौसम भारतीय खेती पर गंभीर असर डाल रहा है, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा है एवं पैदावार कम हो रही हैं। इन बदलावों की वजह से हीट स्ट्रेस हो रहा है, पॉलिनेशन में रुकावट आ रही है, कीड़ों का प्रकोप बढ़ रहा है, और मिट्टी की नमी कम हो रही है, जिससे 2050 तक बारिश पर निर्भर चावल, गेहूं और मक्के की पैदावार में 18–20 प्रतिशत की कमी आने की पूरी संभावना हैं।

अनिश्चित, कम या अधिक बारिश से बुआई का समय बिगड़ जाता है, खासकर खरीफ़ सीज़न में, और ज़्यादा बारिश से मिट्टी का गंभीर कटाव होता हैं। फसल कटाई के समय में सूखे, बाढ़ और बेमौसम तूफानों के बढ़ने से फसलों और संसाधनों को बहुत नुकसान होता हैं। फसलों पर कीड़ों का बढ़ता आक्रमण खाद्य उत्पादकता को बुरी तरीके से तबाह करता है, बढ़ती गर्मी से दूधजन्य पशुओं के सेहत पर भी गंभीर परिणाम होते हैं। अनियमित बारिश किसानों के लिए एक अभिशाप है, देश में वैसे ही सिंचाई की स्थिति समाधनकारक नहीं है, मिट्टी की उर्वरकता लगातार गिर रही हैं।

बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण तापमान में लगातार वृद्धि हुई है, जिसका असर हम सभी भुगत रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी घातक गैसों का बढ़ता उत्सर्जन और उन्हें रोकनेवाले जंगल, पेड़, वन्यजीवों का ह्रास हो रहा है, तो दूसरी ओर शहरों, कस्बों में सीमेंट के जंगल उग रहे है, जिससे बारिश का पानी जमीन सोख नहीं पाती और वह शुद्ध पानी ऐसे ही नालों में बह जाता है, इस कारण तापमान भी कम नहीं होता।

शहरों में पेड़ों की जड़े कमजोर हो रही है, हल्की हवा चलते ही पेड़ जड़ो से टूटकर गिर पड़ते हैं। मानवी सुविधा के नाम पर पहाड़ों को भी क्षति पहुंचाई जा रही है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं अत्यधिक बढ़ गई हैं। अगर हम प्रकृति को बर्बाद करेंगे तो प्रकृति भी बदला लेगी ही। जंगल समृद्ध होंगे तो, वन्यजीव, पशु-पक्षी समृद्ध होंगे, ये जीव ही प्रकृति के रक्षक हैं। इससे तापमान संतुलित होने में मदद मिलेगी। पर्याप्त मात्रा में वर्षा होगी, जिससे जल स्त्रोत समृद्ध होते है, मिट्टी का कटाव रुकता है, वन्यजीव और मानवी संघर्ष रुकता हैं।

ओजोन परत की रक्षा होती है, शुद्ध ऑक्सीज़न-पानी मिलता हैं। जीवों में चलने वाली खाद्य श्रृंखला योग्य रूप में संचालित होती है, श्रृंखला के प्रत्येक जीव को पोषक वातावरण, बेहतर अधिवास का मौका मिलता हैं। मनुष्य के लिए सबसे आवश्यक जिस बात का असर उसके जीवन, स्वास्थ्य, दिनचर्या पर पड़ता है, वह बात सबसे अहम है, परंतु देश में हमेशा मौसम विज्ञान, प्रदूषण, वैश्विक तापमान, पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों को दूर रखकर केवल वाद-विवाद, भेदभाव, राजनीती स्वार्थ, लालच, भ्रष्टाचार और अशांति के लिए भागते लोग नजर आते हैं।

पर्यावरण का संतुलन बनाए तो होने वाली असंख्य घातक बीमारियां, उसके खर्चे, असमय मौत को काफी हद तक रोककर बेहतर जीवनमान दे सकते है, इससे अरबों डॉलर की संपत्ति बचाई जा सकती हैं। सबसे पहले हमने इंसान बनकर पर्यावरण के प्रत्येक घटक का महत्व जानना होगा, देश-दुनिया को बचाने के लिए प्रत्येक का सहभाग आवश्यक हैं। ग्लोबल वार्मिंग को रोकने और पर्यावरण की रक्षा के लिए बेहद कड़े कानून की आवश्यकता हैं। सबसे पहले लोगों में जागरूकता बहुत आवश्यक हैं। पर्यावरण हमारा है, इसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी है, तभी तो हम स्वस्थ, शुद्ध और पोषक वातावरण पा सकेंगे और आनेवाली पीढ़ी को बेहतर कल दे पायेंगे।

लेखक – डॉ. प्रितम भि. गेडाम
मोबाइल / व्हॉट्सॲप क्र. 082374 17041
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