सामाजिक न्याय और बहुजन चेतना के महानायक
नानक चंद्र
भारतीय राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में मान्यवर कांशीराम का नाम एक ऐसे महानायक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने बहुजन समाज को नई पहचान और नई दिशा दी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज के दबे-कुचले और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
कांशीराम साहब का जन्म पंजाब में हुआ और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद सरकारी सेवा में प्रवेश किया। वर्ष 1957 में पुणे की डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ ) में कार्य करते समय उन्होंने सामाजिक भेदभाव को करीब से देखा। अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के कर्मचारियों के साथ होने वाला भेदभाव उन्हें अंदर तक झकझोर गया।
कहा जाता है कि एक बार डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती पर छुट्टी को लेकर विवाद हुआ। कांशीराम साहब ने सवाल उठाया कि यदि अंबेडकर जैसे महान समाज सुधारक की जयंती पर सम्मान नहीं दिया जाएगा तो फिर सामाजिक न्याय की बात कैसे होगी। इसी दौरान उन्होंने डॉ. अंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक “Annihilation of Caste” (जाति का विनाश) पढ़ी, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
इस पुस्तक से प्रेरित होकर कांशीराम साहब ने यह संकल्प लिया कि वे अपना जीवन बहुजन समाज के उत्थान के लिए समर्पित करेंगे। उन्होंने महसूस किया कि जब तक बहुजन समाज शिक्षित, संगठित और राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं होगा, तब तक उसे उसका अधिकार नहीं मिल सकेगा।
इसी विचार के साथ उन्होंने 1973 में बामसेफ़ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लाइज फेडरेशन ) की स्थापना की। यह संगठन शिक्षित कर्मचारियों को सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरित करने का एक मजबूत मंच बना। कांशीराम साहब का मानना था कि समाज का शिक्षित वर्ग केवल अपनी तरक्की तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे समाज के उत्थान के लिए कार्य करे।
उन्होंने बहुजन समाज को एकजुट करने के लिए देशभर में यात्राएं कीं, सभाएं कीं और लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उनका प्रसिद्ध नारा था —
“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।”
इस विचार ने बहुजन समाज में नई राजनीतिक चेतना पैदा की। आगे चलकर कांशीराम साहब ने अपने सामाजिक आंदोलन को राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा )की स्थापना की। इस पार्टी ने भारतीय राजनीति में बहुजन समाज की आवाज को मजबूती दी।
कांशीराम साहब का आंदोलन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन का आंदोलन था। उन्होंने बहुजन समाज को आत्मसम्मान, संगठन और अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया।
आज भी कांशीराम साहब के विचार सामाजिक न्याय के आंदोलन के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि समाज संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करे, तो परिवर्तन अवश्य संभव है।
उनका संघर्ष और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।


