शरद कटियार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जो तस्वीर सामने आई है, उसने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा दोनों पर एक साथ सवाल भी खड़े किए हैं और उम्मीद भी जगाई है। दो चरणों में 92 प्रतिशत से अधिक मतदान सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। यह वह स्तर है, जिसे अब तक देश के किसी भी राज्य ने नहीं छुआ था।
पहले चरण में 93 प्रतिशत से ज्यादा और दूसरे चरण में करीब 92 प्रतिशत मतदान,यह सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, बल्कि एक “साइलेंट पॉलिटिकल वेव” का संकेत भी माना जा रहा है। इससे पहले 2013 में त्रिपुरा ने 91.82 प्रतिशत मतदान के साथ रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन बंगाल ने उसे भी पीछे छोड़ दिया। और सबसे बड़ा सवाल यही है,इतनी भारी भागीदारी आखिर किस बदलाव की ओर इशारा कर रही है?
अगर पिछले चुनावों से तुलना करें, तो तस्वीर और भी चौंकाने वाली हो जाती है। 2021 में जहां कुल मतदान 82.17 प्रतिशत था, वहीं इस बार सीधे 90 प्रतिशत के पार पहुंच जाना बताता है कि मतदाता सिर्फ सक्रिय नहीं हुए, बल्कि “निर्णायक भूमिका” में आ गए हैं। जिन सीटों पर पहले 81-83 प्रतिशत मतदान होता था, वहां अब 92-93 प्रतिशत तक पहुंचना यह साबित करता है कि चुनाव अब सिर्फ राजनीतिक दलों का खेल नहीं रहा, बल्कि जनता खुद मैदान में उतर चुकी है।
लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है।
मतदाता सूची में कमी के बावजूद वोटिंग बढ़ना,यह एक असामान्य ट्रेंड है। 2021 में 7.34 करोड़ मतदाताओं में से 6.03 करोड़ ने वोट डाले थे, जबकि 2026 में 6.82 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 6.25 करोड़ लोगों ने मतदान किया। यानी कम मतदाता, लेकिन ज्यादा मतदान,यह संकेत देता है कि जो लोग वोट डालने पहुंचे, वे पहले से ज्यादा प्रतिबद्ध और सजग थे।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का बयान भी इस पर मुहर लगाता है। उन्होंने इसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा मतदान बताते हुए “लोकतंत्र का पर्व” करार दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ ज्यादा मतदान ही स्वस्थ लोकतंत्र की गारंटी है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि कम चरणों में चुनाव, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और चुनाव आयोग की सख्ती ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन बंगाल जैसे राज्य में, जहां चुनाव अक्सर हिंसा और तनाव के साये में होते रहे हैं, वहां इतनी बड़ी संख्या में लोगों का घरों से निकलकर मतदान करना,यह अपने आप में एक सामाजिक बदलाव का संकेत है।
युवाओं के नजरिए से देखें तो यह चुनाव एक बड़ा संदेश देता है“डिसाइडिंग पावर अब वोटर के हाथ में है।” सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और जमीनी मुद्दों ने इस बार वोटर को ज्यादा जागरूक और आक्रामक बनाया है। अब वह सिर्फ वोट नहीं डाल रहा, बल्कि सत्ता के भविष्य को तय करने का इरादा लेकर बूथ तक पहुंच रहा है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा खतरा भी छिपा है।
इतना बड़ा मतदान अगर सही दिशा में गया, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करेगा। लेकिन अगर यह जातीय, धार्मिक या भावनात्मक ध्रुवीकरण के आधार पर हुआ, तो यह आंकड़ा लोकतंत्र के लिए चुनौती भी बन सकता है। रिकॉर्ड वोटिंग का मतलब हमेशा सकारात्मक बदलाव नहीं होता—कभी-कभी यह बड़े राजनीतिक टकराव की भूमिका भी तैयार करता है।
बंगाल ने एक नया मानक जरूर स्थापित किया है, लेकिन अब नजर नतीजों पर होगी। क्योंकि असली सवाल यही है,क्या यह रिकॉर्ड मतदान “परिवर्तन” लाएगा या सिर्फ “प्रतिस्पर्धा” को और तीखा करेगा?
लोकतंत्र में आंकड़े इतिहास बनाते हैं, लेकिन फैसले भविष्य तय करते हैं,और बंगाल अब उसी मोड़ पर खड़ा है।


