मायावती की नई चाल: ‘मौन राजनीति’ से निकलकर फिर सत्ता के केंद्र की ओर

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प्रशांत कटियार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का हर कदम नपा-तुला और संदेशभरा होता है। वे न बोलकर भी राजनीति को दिशा दे देती हैं। पिछले कुछ वर्षों से उनका राजनीतिक मौन चर्चा में था, लेकिन अब वह मौन टूटा है। पिछले एक महीने में मायावती की लगातार चार बड़ी बैठकों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि बसपा अब सिर्फ संगठन बचाने नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की तैयारी में जुट गई है। लखनऊ में बुधवार को हुई बसपा की मुस्लिम नेताओं के साथ बंद कमरे की बैठक ने इस सक्रियता को नया आयाम दे दिया। इस बैठक में प्रदेशभर के 75 जिलों के जिलाध्यक्ष, 90 कोऑर्डिनेटर, 36 मुस्लिम भाईचारा कमेटियों के अध्यक्ष और 36 कोर कमेटी सदस्य शामिल हुए। करीब 450 मुस्लिम नेताओं के साथ हुई इस बैठक में मायावती के साथ उनके भतीजे आकाश आनंद और पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा भी मौजूद रहे।

यह बैठक मायावती की हालिया रणनीतिक दिशा का अहम हिस्सा थी। उन्होंने 25 अक्टूबर को ‘मुस्लिम समाज भाईचारा संगठन’ की घोषणा की थी, और चार दिन बाद ही मुस्लिम नेताओं के साथ इस विशेष बैठक को बुलाया। इसमें उन्होंने मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) पर चर्चा करते हुए संगठन को निर्देश दिया कि हर जिले और बूथ स्तर पर मुस्लिम व दलित मतदाताओं को मजबूती से जोड़ने का अभियान चलाया जाए। लखनऊ के बसपा कार्यालय में हुई इस बैठक की एक खास बात यह रही कि सीनियर बसपा नेता पीछे की पंक्तियों में बैठे, जबकि मुस्लिम नेताओं को पहली पंक्ति में बैठाया गया। राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश था — कि मायावती अब बसपा के पुराने ढांचे में नया संतुलन और प्राथमिकता तय कर रही हैं।

मायावती की इस बैठक को उनके पिछले एक महीने की गतिविधियों से जोड़कर देखा जाए तो एक साफ़ ट्रेंड दिखता है — 9 अक्टूबर को लखनऊ में बड़ी जनसभा, जिसमें पार्टी की नई दिशा का खाका प्रस्तुत किया गया। 16 और 19 अक्टूबर को दो चरणों में 400-400 जिला व मंडल पदाधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकें हुईं और अब 29 अक्टूबर को मुस्लिम नेताओं के साथ पहली बार सामूहिक बैठक। इन बैठकों का उद्देश्य सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि संगठन के बिखरे ढांचे को फिर से एकीकृत करना है। मायावती अब हर स्तर पर नई ऊर्जा भरने में लगी हैं — “पार्टी पहले, प्रचार बाद में” की नीति पर चलते हुए।

मायावती के साथ मंच पर मौजूद आकाश आनंद का पैर छूकर आशीर्वाद लेना केवल भावनात्मक क्षण नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक था। यह इस बात का संकेत है कि बसपा में अब नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ रही है। आकाश आनंद को संगठन की नई जिम्मेदारियों के साथ सामने लाकर मायावती यह संदेश देना चाहती हैं कि पार्टी भविष्य की राजनीति के लिए तैयार है।

बसपा के इतिहास में 2007 की जीत मायावती के “सर्वजन” फार्मूले की देन थी — दलितों के साथ ब्राह्मण और मुस्लिम समाज का तालमेल। आज 2025 में वह फिर उसी फॉर्मूले को नए अंदाज़ में आजमा रही हैं। इस बार उनका लक्ष्य है — दलित-मुस्लिम गठबंधन को फिर से मजबूती देना और ओबीसी वर्ग में बढ़ती भाजपा विरोधी भावना को अपने पक्ष में मोड़ना। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा के ओबीसी वोटों में धीरे-धीरे सेंध लग रही है, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन से मुस्लिम समाज का पूरा भरोसा जुड़ा नहीं है। ऐसे में मायावती उस “साइलेंट वोट बैंक” को साधना चाहती हैं, जो नाराज़ तो है, पर विकल्प खोज रहा है।

मायावती की लगातार बढ़ती सक्रियता यह साबित करती है कि बसपा अब निष्क्रिय दौर से बाहर आ चुकी है। वे न गठबंधन पर निर्भर रहना चाहती हैं, न किसी सत्ताधारी के सहारे राजनीति करना। उनकी रणनीति साफ़ है —बसपा को फिर उसी मूल विचारधारा पर लौटाना, जिसने कभी उसे उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाया था। मौन राजनीति से बाहर निकलकर मायावती अब पूरी तैयारी के साथ एक बार फिर सत्ता के केंद्र की ओर बढ़ रही हैं।

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