– कांग्रेस हो सपा के गठबंधन की खटाई में बात अब आम चर्चा
शरद कटियार
लखनऊ। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सीटों का सवाल अहम होता जा रहा है। इसी बीच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का 30 सितंबर की इंडिया गठबंधन की बैठक में स्वयं शामिल न होना और इसके कुछ दिन पहले 24 सितंबर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से पीडीए रथ यात्रा की शुरुआत सांप संकेत दे गई की गठबंधन खटाई में है और सपा अपने मॉडल पर अकेले चुनाव लड़ेगी ।
हुईं इंडिया बैठक मे सपा सुप्रीमो अखिलेश ने बैठक में अपनी जगह सपा के वरिष्ठ नेता को भेजने का फैसला किया था। उन्होंने इसके लिए पहले से निर्धारित राजनीतिक कार्यक्रमों और अन्य जरूरी कार्यों का हवाला दिया। हालांकि, यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ जब उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे पर अभी अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है।
24 सितंबर को रायबरेली से पीडीए रथ यात्रा शुरू करना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से राहुल गांधी सांसद हैं। सपा ने यहां से अभियान शुरू कर एक तरफ अपने संगठन को सक्रिय करने का संदेश दिया, तो दूसरी तरफ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग पर आधारित अपने पीडीए राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाया।
रायबरेली के विधानसभा समीकरण भी सपा के लिए महत्वपूर्ण हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने जिले की 4 सीटें जीती थीं,बछरावां, हरचंदपुर, सरेनी और ऊंचाहार। बाद में ऊंचाहार विधायक मनोज पांडेय सपा छोड़कर भाजपा में चले गए।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में सपा ने 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं। दोनों दलों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। सपा का प्रदेश में मत प्रतिशत करीब 33.6 प्रतिशत और कांग्रेस का करीब 9.5 प्रतिशत रहा।
यही आंकड़े 2027 की संभावित सीट-बंटवारे की बातचीत में सपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार बनते हैं। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के परिणामों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों चुनावों में मुद्दे, उम्मीदवार और क्षेत्रीय समीकरण अलग होते हैं।
रायबरेली में अखिलेश यादव ने गठबंधन को लेकर सीट बंटवारे पर जीत की क्षमता के आधार पर फैसला करने की बात कही। यानी जिस दल की जिस सीट पर जीतने की स्थिति मजबूत हो, सीट उसके हिस्से में जाने का तर्क सामने रखा गया।
यहीं से सपा-कांग्रेस की बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है,2027 में सीटों का बंटवारा संख्या के आधार पर होगा या विधानसभा क्षेत्रवार राजनीतिक ताकत के आधार पर?
कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से भी सीट बंटवारे को लेकर बयान सामने आए हैं। सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को जरूरी बताया है, जबकि सपा और कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं के बीच सीटों और प्रभाव क्षेत्रों को लेकर बयानबाजी भी हुई है।
अखिलेश यादव ने 2 अक्टूबर को भी कहा कि 2027 का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ा जाएगा, जिससे यह संकेत मिलता है कि बैठक से उनकी दूरी को गठबंधन से अलग होने की घोषणा के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम को दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला, सपा कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखने की बात कर रही है। दूसरा, सीटों के बंटवारे और अपने राजनीतिक प्रभाव को लेकर वह अपनी स्वतंत्र ताकत भी सामने रख रही है। रायबरेली जैसे कांग्रेस प्रभाव वाले क्षेत्र से पीडीए अभियान शुरू करना इसी राजनीतिक स्थिति का एक सार्वजनिक उदाहरण है।
गठबंधन बैठक से दूरी के बाद सपा का रायबरेली से पीडीए रथ यानी दो फाड़


