– जब चिकित्सा सेवा से बाजार का कारोबार बड़ा हो जाए
– तब सवाल केवल इलाज का नहीं, भरोसे का भी होता है।
शरद कटियार
आयुर्वेद भारत की हजारों वर्ष पुरानी चिकित्सा परंपरा है। जड़ी-बूटियों, आहार-विहार और जीवनशैली के माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण की इसकी अवधारणा ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन आज आयुर्वेद के नाम पर तेजी से बढ़ते बाजार ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आयुर्वेद वास्तव में उपचार की सेवा बना हुआ है या कहीं-कहीं यह केवल कमाई का जरिया बनता जा रहा है?
आज शहरों से लेकर गांवों तक आयुर्वेदिक क्लीनिक, पंचकर्म केंद्र, औषधि विक्रेता और तरह-तरह के स्वास्थ्य उत्पाद तेजी से बढ़ रहे हैं। समस्या संस्थानों या बाजार के विस्तार से नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब मरीज की बीमारी से ज्यादा उसकी जेब पर नजर होने लगे।
कुछ जगहों पर ऐसे दावे सुनाई देते हैं कि एक विशेष आयुर्वेदिक दवा हर बीमारी का इलाज कर सकती है। कहीं कुछ दिनों में वर्षों पुरानी बीमारी ठीक करने का दावा किया जाता है, तो कहीं बिना पर्याप्त चिकित्सकीय जांच के उपचार शुरू कर दिया जाता है। चिकित्सा विज्ञान में चमत्कार के दावों से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रमाण, सही निदान और प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह है।
चिकित्सा का मूल उद्देश्य मरीज को स्वस्थ करना है। चाहे चिकित्सा पद्धति कोई भी हो, चिकित्सक के सामने आने वाला व्यक्ति सबसे पहले एक मरीज है, ग्राहक नहीं।
आयुर्वेदिक उपचार लेने वाले लोगों के साथ भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। बीमारी की गंभीरता, मरीज की उम्र, दूसरी दवाएं, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य परिस्थितियों को समझे बिना दवा देना जोखिम पैदा कर सकता है। खासकर गंभीर बीमारियों में केवल विज्ञापन या किसी परिचित के अनुभव के आधार पर इलाज करना उचित नहीं है।
आज सोशल मीडिया ने स्वास्थ्य संबंधी दावों को घर-घर पहुंचा दिया है। आकर्षक वीडियो, चमकदार पैकेजिंग और बड़े-बड़े दावे किसी उत्पाद को लोकप्रिय तो बना सकते हैं, लेकिन लोकप्रियता उपचार की प्रभावशीलता का प्रमाण नहीं है।
‘शत-प्रतिशत इलाज’, ‘हर बीमारी का समाधान’, ‘बिना साइड इफेक्ट’ और ‘कुछ ही दिनों में बीमारी खत्म’ जैसे दावों को लेकर उपभोक्ताओं को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। चिकित्सकीय सलाह और वैज्ञानिक प्रमाण के बिना ऐसे दावों पर भरोसा करना नुकसानदायक हो सकता है।
यह कहना गलत होगा कि आयुर्वेद में उपचार की उपयोगिता नहीं है। आयुर्वेद का अपना चिकित्सा दर्शन, औषधीय परंपरा और प्रशिक्षित चिकित्सकों की व्यवस्था है। लेकिन किसी भी चिकित्सा पद्धति की प्रतिष्ठा तभी मजबूत होती है, जब उसके नाम पर होने वाले गलत दावों और अनियमितताओं पर प्रभावी निगरानी हो।
सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि फर्जी चिकित्सकों, भ्रामक विज्ञापनों, अवैध उपचार केंद्रों और अप्रमाणित दावों पर कार्रवाई हो। वहीं चिकित्सकों और औषधि निर्माताओं को भी मरीज की सुरक्षा को व्यावसायिक लाभ से ऊपर रखना चाहिए।
आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति अक्सर सस्ते और आसान इलाज की तलाश में रहता है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर यदि कोई व्यक्ति बीमारी को डर बनाकर महंगे पैकेज बेचता है तो यह चिकित्सा सेवा नहीं, मरीज की मजबूरी का व्यावसायिक इस्तेमाल है।
जरूरत इस बात की है कि आयुर्वेद को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए। मरीज यह समझे कि हर प्राकृतिक चीज सुरक्षित हो, यह जरूरी नहीं और हर आयुर्वेदिक उत्पाद अपने आप में उपचार का प्रमाण नहीं है।
आयुर्वेद को बचाने के लिए उसके खिलाफ खड़ा होना नहीं, बल्कि उसके नाम पर होने वाले गलत कारोबार के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है।
किसी भी चिकित्सा पद्धति की असली सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उसने कितने मरीजों को सुरक्षित, जिम्मेदार और उचित उपचार दिया,न कि उसने कितनी दवाएं और कितने पैकेज बेचे।
आयुर्वेद में इलाज या धंधा?


