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Sunday, September 6, 2026

एआई करे होमवर्क, बच्चे करें मौज—पर सीखेंगे कब?

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डॉ. विजय गर्ग

बच्चा पहली पाठ्यपुस्तक खोलने, कक्षा में प्रवेश करने या वर्णमाला लिखना सीखने से पहले ही शिक्षा की यात्रा शुरू कर देता है। जीवन के शुरुआती पाठ हमेशा किताबों में नहीं मिलते। वे घर में—माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहनों और उस दैनिक वातावरण से सीखे जाते हैं, जिसमें बच्चा बड़ा होता है। इस अर्थ में घर वास्तव में किताबों से पहले की पाठशाला है।

बच्चा सबसे पहले देखकर सीखता है। परिवार के सदस्य एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं, बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, कठिन परिस्थितियों का सामना कैसे करते हैं और दूसरे लोगों के प्रति किस तरह का व्यवहार रखते हैं—इन सबका बच्चे के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ईमानदारी, दया, सम्मान, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता जैसे मूल्यों को समझने से बहुत पहले बच्चे उन्हें अपने घर में व्यवहार के रूप में देखते हैं।

इसलिए माता-पिता बच्चे के प्रथम शिक्षक होते हैं। उनके शब्द महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन उनके कार्य उससे भी अधिक प्रभावशाली होते हैं। जो बच्चा अपने आसपास ईमानदारी देखता है, वह सत्य के महत्व को बेहतर ढंग से समझता है। जो बच्चा परिवार के सदस्यों को दूसरों की सहायता करते देखता है, उसमें करुणा की भावना विकसित होती है। जिस घर में एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनी जाती है, वहाँ बच्चा सम्मान और संवाद का महत्व सीखता है।

घर बच्चे को अनुशासन और जिम्मेदारी का पहला अनुभव भी देता है। अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित रखना, घर के छोटे-छोटे कामों में सहयोग करना, समय का सम्मान करना, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना और साझा स्थानों की देखभाल करना जैसी सरल आदतें धीरे-धीरे ऐसे गुण विकसित करती हैं, जो जीवनभर उपयोगी रहते हैं। ये पाठ परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका में दिखाई नहीं देते, लेकिन जीवन की चुनौतियों का सामना करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भावनात्मक शिक्षा भी घर से ही शुरू होती है। बच्चे खुशी, निराशा, क्रोध और भय जैसी भावनाओं को व्यक्त करना अपने आसपास के बड़ों को देखकर सीखते हैं। सहयोगपूर्ण और समझदार पारिवारिक वातावरण बच्चों में आत्मविश्वास, धैर्य, सहानुभूति और कठिन परिस्थितियों से उबरने की क्षमता विकसित कर सकता है। जब बच्चों को बिना अनावश्यक भय के प्रश्न पूछने और अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है, तो उनमें जिज्ञासा और स्वतंत्र चिंतन भी विकसित होता है।

आज की अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दुनिया में माता-पिता अक्सर अंकों, परीक्षाओं, कोचिंग और शैक्षणिक उपलब्धियों पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं। औपचारिक शिक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन वह पारिवारिक जीवन से मिलने वाली सीख का स्थान नहीं ले सकती। स्कूल गणित, विज्ञान, भाषाएँ और इतिहास पढ़ा सकते हैं, लेकिन चरित्र की नींव अक्सर उससे बहुत पहले और घर के वातावरण में रखी जाती है।

तकनीक के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने इस जिम्मेदारी को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। आज बच्चे मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी प्राप्त करते हैं। लेकिन जानकारी और विवेक एक ही चीज नहीं हैं। बच्चों को सही और गलत, सत्य और भ्रामक सूचना तथा उपयोगी सीख और केवल मनोरंजन के बीच अंतर समझने के लिए मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। यह मार्गदर्शन सबसे पहले घर से ही मिलना चाहिए।

दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्य भी इस अनौपचारिक शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी कहानियाँ, अनुभव, परंपराएँ और जीवन की व्यावहारिक समझ बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं और उन्हें स्क्रीन तथा पाठ्यपुस्तकों से आगे की दुनिया समझने में मदद करती हैं। भोजन की मेज पर बातचीत, घर की जिम्मेदारियों में भागीदारी, पारिवारिक चर्चाएँ और दूसरों के प्रति किए गए छोटे-छोटे अच्छे कार्य—ये सभी मूल्यवान सीख बन सकते हैं।

एक अच्छे घर का किसी औपचारिक स्कूल जैसा होना आवश्यक नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वहाँ सीखना स्वाभाविक रूप से हर दिन होता है। बच्चा देखते हुए, सुनते हुए, प्रश्न पूछते हुए, गलतियाँ करते हुए और पारिवारिक जीवन में भाग लेते हुए सीखता है। हर बातचीत एक पाठ बन सकती है और परिवार का प्रत्येक बड़ा सदस्य एक शिक्षक की भूमिका निभा सकता है।

अंततः किताबें ज्ञान देती हैं, स्कूल शैक्षणिक क्षमताओं का विकास करते हैं और शिक्षक बौद्धिक विकास का मार्गदर्शन करते हैं। लेकिन इन सब से पहले घर बच्चे के व्यक्तित्व और चरित्र की नींव तैयार करता है।

यदि हम चाहते हैं कि बच्चे ज्ञानवान, जिम्मेदार, संवेदनशील और आत्मविश्वासी व्यक्ति बनें, तो हमें उन पाठों के महत्व को समझना होगा जो वे किताब खोलने से पहले ही सीख जाते हैं।

घर केवल वह स्थान नहीं है जहाँ बच्चा बड़ा होता है। घर वह पहली पाठशाला है, जहाँ बच्चा जीवन जीना सीखता है।

डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् एवं प्रख्यात गणितज्ञ
मलोट, पंजाब

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