200 से अधिक टोल प्लाजा तक पहुंचा कथित समानांतर नेटवर्क, सात राज्यों में ईडी की दस्तक ने खोली व्यवस्था की कमजोरियां
शरद कटियार
टोल प्लाजा पर वाहन चालक जब निर्धारित शुल्क अदा करता है तो उसकी सहज अपेक्षा होती है कि जमा की गई राशि सीधे और पारदर्शी तरीके से अधिकृत व्यवस्था में दर्ज हो। लेकिन यदि इसी व्यवस्था के समानांतर कोई दूसरा सॉफ्टवेयर चलाकर वसूली का हिसाब अलग से रखा जाए तो सवाल केवल कुछ करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी टोल व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़ा हो जाता है।
उत्तर प्रदेश में सामने आए टोल वसूली से जुड़े मामले ने इसी गंभीर सवाल को जन्म दिया है। कथित तौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की अधिकृत व्यवस्था के समानांतर एक दूसरा सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किए जाने और उसके माध्यम से वसूली के आंकड़ों में हेरफेर किए जाने की जांच अब प्रवर्तन निदेशालय तक पहुंच चुकी है। लखनऊ जोन की ईडी टीम ने सात राज्यों में एक साथ कार्रवाई करते हुए वाराणसी समेत 14 ठिकानों पर तलाशी ली है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मामला किसी एक टोल प्लाजा तक सीमित रहने के बजाय 200 से अधिक टोल प्लाजा तक समानांतर व्यवस्था के संभावित विस्तार की ओर इशारा कर रहा है। जांच में करीब 100 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय खेल की बात सामने आ रही है। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है तो यह केवल राजस्व की कथित चोरी का मामला नहीं होगा, बल्कि डिजिटल निगरानी और संस्थागत नियंत्रण की गंभीर विफलता भी मानी जाएगी।
टोल वसूली आज पूरी तरह तकनीक आधारित व्यवस्था पर निर्भर है। वाहन की पहचान, शुल्क निर्धारण, भुगतान और लेनदेन का रिकॉर्ड डिजिटल माध्यम से तैयार होता है। ऐसी स्थिति में किसी समानांतर सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सबसे पहला सवाल यही है कि अधिकृत व्यवस्था के समानांतर दूसरा तंत्र तैयार कैसे हुआ? दूसरा सवाल यह कि उसे चलाने की अनुमति किस स्तर पर मिली और तीसरा, इतने बड़े नेटवर्क में उसके इस्तेमाल का पता समय रहते क्यों नहीं चल सका?
यदि कोई बाहरी या अनधिकृत व्यवस्था टोल वसूली के वास्तविक आंकड़ों को प्रभावित करने में सक्षम हो गई थी, तो यह तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक निगरानी की भी परीक्षा है।
इस मामले की शुरुआती कड़ी मिर्जापुर के अतरौला टोल प्लाजा से सामने आने की बात कही जा रही है। विशेष कार्यबल की कार्रवाई में टोल वसूली से जुड़ी कथित अनियमितताओं और समानांतर व्यवस्था का खुलासा हुआ। इसके बाद मामला वित्तीय लेनदेन और धन के संभावित प्रवाह तक पहुंचा और अब ईडी ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है।
सात राज्यों में एक साथ छापेमारी इस बात का संकेत है कि जांच एजेंसी मामले को स्थानीय स्तर की अनियमितता मानकर नहीं चल रही। शिवा बिल्डटेक के मालिकों से जुड़े परिसरों पर कार्रवाई भी इसी जांच का हिस्सा बताई जा रही है।
तलाशी के दौरान दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, कंप्यूटर सिस्टम और वित्तीय लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड जांच के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं। इनसे यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कथित समानांतर सॉफ्टवेयर किसने तैयार किया, किन टोल प्लाजा पर उसका इस्तेमाल हुआ और उससे होने वाली रकम आखिर किन खातों या संस्थाओं तक पहुंची।
इस पूरे प्रकरण को केवल 100 करोड़ रुपये की संभावित वित्तीय अनियमितता के आंकड़े से देखना उचित नहीं होगा। असली चिंता उस व्यवस्था की है जिसमें प्रतिदिन लाखों वाहन टोल का भुगतान करते हैं और करोड़ों रुपये का राजस्व इकट्ठा होता है।
यदि अधिकृत डिजिटल प्रणाली के बाहर कोई दूसरा रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है, तो यह जानना जरूरी है कि वास्तविक वसूली और सरकारी रिकॉर्ड के बीच अंतर कितना रहा। कितने समय तक यह व्यवस्था चली और इससे सरकारी राजस्व को कितना नुकसान हुआ,इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि इस कथित नेटवर्क में केवल तकनीकी मदद देने वाले लोग शामिल थे या टोल संचालन से जुड़े अन्य स्तरों पर भी मिलीभगत थी।
टोल व्यवस्था को पारदर्शी और तेज बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा है। लेकिन तकनीक अपने आप में पारदर्शिता की गारंटी नहीं होती। यदि निगरानी कमजोर हो तो वही तकनीक बड़े पैमाने पर अनियमितता का माध्यम भी बन सकती है।
इसलिए अब आवश्यकता केवल दोषियों की पहचान तक सीमित रहने की नहीं है। जरूरी है कि पूरे टोल नेटवर्क का तकनीकी ऑडिट कराया जाए। अधिकृत सॉफ्टवेयर के बाहर किसी भी प्रणाली की पहुंच की नियमित जांच हो और प्रत्येक टोल प्लाजा के आंकड़ों का स्वतंत्र मिलान किया जाए।
साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी एक निजी एजेंसी या ऑपरेटर के पास ऐसी तकनीकी शक्ति न हो जिससे वह आधिकारिक आंकड़ों को प्रभावित कर सके।
ईडी की कार्रवाई से मामले की गंभीरता सामने आई है, लेकिन छापेमारी अपने आप में अंतिम समाधान नहीं है। जांच पूरी होने के बाद यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और धन की वसूली के साथ-साथ उस व्यवस्था की भी पहचान होनी चाहिए जिसने कथित गड़बड़ी को इतने बड़े स्तर तक पहुंचने दिया।
सवाल यह नहीं कि 14 ठिकानों पर छापे पड़े या सात राज्यों में कार्रवाई हुई। बड़ा सवाल यह है कि 200 से अधिक टोल प्लाजा तक कथित समानांतर व्यवस्था पहुंचने से पहले निगरानी तंत्र कहां था?
टोल वसूली जनता से सीधे जुड़े राजस्व का विषय है। इसलिए इसमें पारदर्शिता केवल सरकारी आवश्यकता नहीं, बल्कि जनता का अधिकार है। इस प्रकरण की जांच जितनी निष्पक्ष और गहराई से होगी, उतना ही स्पष्ट होगा कि यह किसी सीमित समूह की करतूत थी या व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठाकर तैयार किया गया बड़ा नेटवर्क।
फिलहाल जांच एजेंसियों की कार्रवाई से उम्मीद है कि कथित ‘दूसरे सॉफ्टवेयर’ के पीछे छिपी पूरी तस्वीर सामने आएगी। लेकिन इसके साथ एक व्यापक सबक भी जरूरी है—डिजिटल व्यवस्था का मतलब तभी पारदर्शिता है, जब उसके हर स्तर पर निगरानी, जवाबदेही और स्वतंत्र सत्यापन भी उतना ही मजबूत हो।


