शरद कटियार
नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है, लेकिन प्राकृतिक आपदा का खतरा अभी टला नहीं है। सैकड़ों लोगों की मौत, हजारों के लापता होने और सड़क-पुलों के तबाह होने के बीच नेपाल-चीन सीमा के पास बनी दो नई झीलें अब नई चिंता का कारण बन गई हैं। एक झील से पानी रिस रहा है, जबकि दूसरी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। यदि इसका प्राकृतिक बांध टूटा तो निचले इलाकों में फिर अचानक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
इस त्रासदी ने नेपाल के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर मलबे में जिंदगी की तलाश और लापता लोगों को खोजने का अभियान जारी है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ों में बढ़ते जलस्तर पर नजर रखना जरूरी है। खराब मौसम, क्षतिग्रस्त सड़कें और दुर्गम पहाड़ी इलाकों ने राहत कार्य को और कठिन बना दिया है। हजारों परिवार घर, रोजगार और अपनों को खोने के दर्द से गुजर रहे हैं।
ऐसे कठिन समय में भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए राहत सामग्री, डॉक्टरों और विशेषज्ञों की टीम नेपाल भेजी है। भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने के साथ-साथ नेपाल को तकनीकी सहायता की पेशकश भी की गई है। नेपाल द्वारा भारत की मदद के लिए जताया गया आभार दोनों देशों के मजबूत संबंधों को दर्शाता है।
अब सबसे जरूरी है कि नेपाल, भारत और चीन आपसी समन्वय से नई झीलों की लगातार निगरानी करें। सैटेलाइट, कैमरों और सेंसर के जरिए जलस्तर में होने वाले बदलाव की तत्काल जानकारी जुटाई जाए और खतरा बढ़ने पर निचले क्षेत्रों को समय रहते खाली कराया जाए।
नेपाल की यह आपदा केवल राहत और बचाव की चुनौती नहीं है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारियों की भी बड़ी परीक्षा है। प्रकृति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत चेतावनी व्यवस्था और समय पर बचाव अभियान से जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इस समय नेपाल को संवेदना से ज्यादा संगठित सहयोग, तकनीकी विशेषज्ञता और तेज फैसलों की जरूरत है।


