शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में एक दिन में 35 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी का स्वरूप देने का प्रयास है। गोरखपुर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा “पौधरोपण महायज्ञ-2026” का शुभारंभ और “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत स्वयं पौधारोपण करना एक प्रतीकात्मक संदेश भी है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पूरी दुनिया ने महसूस किए हैं। अनियमित वर्षा, भीषण गर्मी, बढ़ता वायु प्रदूषण, गिरता भूजल स्तर और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाएं यह संकेत देती हैं कि यदि प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने गंभीर संकट खड़ा होगा। ऐसे समय में वृक्षारोपण जैसे अभियान केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व बन जाते हैं।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में जिस बात पर सबसे अधिक बल दिया, वह यह थी कि धरती केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि हमारी माता है। भारतीय संस्कृति सदियों से प्रकृति को पूजनीय मानती रही है। वेदों और उपनिषदों से लेकर लोक परंपराओं तक वृक्ष, नदियां और पर्वत जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्या:” का संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार तेज हुई है। नए एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारे, शहरी विस्तार और आधुनिक आधारभूत संरचना राज्य को नई दिशा दे रहे हैं। लेकिन यदि इस विकास के साथ हरित क्षेत्र का विस्तार न हो तो भविष्य में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है। इसलिए विकास के साथ वनावरण बढ़ाने की नीति एक सकारात्मक संकेत है। यदि वास्तव में वन क्षेत्र बढ़ा है और कार्बन अवशोषण की क्षमता में वृद्धि हुई है, तो यह राज्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी।
हालांकि किसी भी वृक्षारोपण अभियान की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक सफलता तब होगी जब वर्षों बाद वही पौधे विशाल वृक्ष बनकर लोगों को छाया, ऑक्सीजन और स्वच्छ वातावरण प्रदान करें। अक्सर देखा गया है कि लाखों पौधे लगाए जाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन उनके संरक्षण, सिंचाई और निगरानी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। यदि पौधे जीवित नहीं रहे तो करोड़ों के आंकड़े केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित रह जाएंगे।
“एक पेड़ माँ के नाम” अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भावनात्मक अपील है। जब किसी पौधे को मां, पिता, गुरु या किसी प्रियजन की स्मृति से जोड़ा जाता है तो उसके संरक्षण की संभावना स्वतः बढ़ जाती है। यही इस अभियान की वास्तविक शक्ति भी है। यदि प्रत्येक परिवार अपने जीवन के महत्वपूर्ण अवसरों पर एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाए, तो हरित क्रांति किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि समाज की चेतना से संभव होगी।
आज आवश्यकता केवल वृक्ष लगाने की नहीं, बल्कि जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, तालाबों के पुनर्जीवन, जैव विविधता के संरक्षण और प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण की भी है। पर्यावरण संरक्षण एक समग्र अभियान है, जिसमें सरकार, प्रशासन, पंचायतें, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और आम नागरिक सभी की समान भागीदारी आवश्यक है।
यदि प्रदेश का प्रत्येक नागरिक प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसे वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखने का संकल्प ले, तो करोड़ों पौधे लगाने का लक्ष्य अपने आप स्थायी परिणाम में बदल जाएगा। पर्यावरण की रक्षा केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए उपहार नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की नैतिक जिम्मेदारी भी है। यही “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान का सबसे बड़ा संदेश है।


