प्रभात यादव
कभी रिश्तों की बुनियाद प्रेम, विश्वास और अपनापन हुआ करती थी। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़े रहते थे। किसी की आर्थिक स्थिति, पद या प्रतिष्ठा से अधिक महत्व उसके व्यक्तित्व और इंसानियत का होता था। लेकिन बदलते समय के साथ रिश्तों की परिभाषा भी बदलती जा रही है। आज कई जगहों पर रिश्तों की गहराई दिल से नहीं, बल्कि हैसियत से मापी जाने लगी है।
जिस व्यक्ति के पास धन, पद या प्रभाव होता है, उसके आसपास लोगों की भीड़ दिखाई देती है। उसकी हर बात को महत्व मिलता है और उसके साथ संबंध बनाने की होड़ लग जाती है। वहीं, जो व्यक्ति संघर्ष के दौर से गुजर रहा होता है, उसकी खबर लेने वाले भी कम रह जाते हैं। यही आज के समाज की सबसे बड़ी विडंबना है।
हैरानी तब होती है, जब अपने भी इंसान की अच्छाइयों या उसके संघर्ष को नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति को देखकर व्यवहार बदल लेते हैं। सफलता मिलने पर वही लोग बधाई देने पहुंच जाते हैं, जो मुश्किल समय में साथ खड़े होने से बचते रहे। ऐसे रिश्ते केवल अवसर के साथी होते हैं, जीवन के नहीं।
सच्चा रिश्ता वह होता है जो परिस्थितियों के साथ नहीं बदलता। जो आपकी जेब नहीं, बल्कि आपका दिल देखता है। जो आपके अच्छे दिनों में नहीं, बल्कि बुरे वक्त में आपका हाथ थामे रहता है। जीवन में ऐसे लोगों की संख्या भले कम हो, लेकिन वही सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।
धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन इनसे रिश्तों की कीमत तय नहीं होनी चाहिए। हैसियत समय के साथ बदल सकती है, लेकिन सच्चा प्रेम, विश्वास और अपनापन जीवनभर साथ रहता है। इसलिए रिश्तों को स्वार्थ की कसौटी पर नहीं, संवेदनाओं की नींव पर परखना चाहिए।
याद रखिए, दौलत से लोग प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन दिल केवल सच्चे व्यवहार से जीते जाते हैं। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं, हैसियत भी बदल जाती है, पर जो रिश्ते दिल से जुड़े होते हैं, वे हर परीक्षा में अटल रहते हैं। यही रिश्तों की वास्तविक पहचान है।


