शरद कटियार
भारत और जापान के संबंध पिछले एक दशक में केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि अब वे सामरिक, रणनीतिक और वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं। ऐसे समय में जब जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने भारत दौरे के दौरान “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” की अवधारणा का खुलकर समर्थन किया, चीन की तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक मानी जा सकती है। यह घटनाक्रम केवल एक बयान का विवाद नहीं, बल्कि एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है।
‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा का मूल उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून, समुद्री सुरक्षा, निर्बाध व्यापार, नौवहन की स्वतंत्रता और सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान सुनिश्चित करना है। भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश इसे क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलन के लिए आवश्यक मानते हैं। दूसरी ओर, चीन इसे अपने बढ़ते प्रभाव को सीमित करने की रणनीति के रूप में देखता है।
जापानी प्रधानमंत्री का यह कहना कि हिंद-प्रशांत किसी एक देश के प्रभुत्व का क्षेत्र नहीं होना चाहिए, वस्तुतः एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय सोच को प्रतिबिंबित करता है। आज विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं चाहती हैं कि समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें, व्यापार बिना किसी दबाव के संचालित हो और छोटे-बड़े सभी देशों को समान अवसर मिलें। यह विचार किसी एक राष्ट्र के विरुद्ध नहीं, बल्कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के पक्ष में है।
चीन की आपत्ति भी उसकी रणनीतिक चिंताओं से जुड़ी है। दक्षिण चीन सागर, ताइवान और पूर्वी चीन सागर को लेकर पहले से ही चीन के पड़ोसी देशों के साथ मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में यदि भारत और जापान जैसे प्रभावशाली लोकतांत्रिक देश क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करते हैं, तो बीजिंग इसे अपने प्रभाव क्षेत्र के लिए चुनौती के रूप में देखता है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक संतुलन पर आधारित रही है। भारत किसी सैन्य गुट का हिस्सा बने बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। जापान के साथ भी भारत का संबंध केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि बुलेट ट्रेन, आधारभूत संरचना, निवेश, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला जैसे अनेक क्षेत्रों में गहरा सहयोग विकसित हो चुका है।
चीन की प्रतिक्रिया यह भी दर्शाती है कि एशिया की भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बनने जा रहा है। ऐसे में विभिन्न देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग की भी आवश्यकता होगी।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक साझेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखे। मजबूत कूटनीति का अर्थ किसी के विरोध में खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हुए नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करना है।
स्पष्ट है कि भारत-जापान की बढ़ती साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस नए एशिया की तस्वीर भी है, जहां शक्ति का केंद्र बदल रहा है और देशों के बीच साझेदारी नए वैश्विक समीकरण तय कर रही है। ऐसे दौर में संवाद, कूटनीति और पारस्परिक सम्मान ही क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का सबसे प्रभावी मार्ग हो सकते हैं।


