डॉ आशीष यादव
दुनिया में हर व्यक्ति अपनी बात साबित करने की कोशिश करता है। कोई तर्क देता है, कोई बहस करता है और कोई अपनी आवाज़ ऊँची कर देता है। लेकिन सत्य को इन सबकी आवश्यकता नहीं होती। सत्य जानता है कि उसका सबसे बड़ा साक्षी समय है। इसलिए वह कई बार मौन रहना चुनता है।
मौन का अर्थ कमजोरी नहीं होता। यह आत्मविश्वास की सबसे ऊँची अवस्था है। जो व्यक्ति सच के साथ खड़ा होता है, उसे हर आरोप का जवाब तुरंत देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे विश्वास होता है कि आज भले ही लोग उसे गलत समझ लें, लेकिन एक दिन परिस्थितियाँ स्वयं उसके पक्ष में बोलेंगी।
इतिहास गवाह है कि झूठ कुछ समय तक चमक सकता है, पर स्थायी नहीं होता। सत्य भले देर से सामने आए, लेकिन जब आता है तो हर भ्रम का अंत कर देता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति हर विवाद में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करता। वह समय को अपना न्यायाधीश बनने देता है।
आज के दौर में सोशल मीडिया और अफवाहों के बीच लोगों ने तुरंत निर्णय लेना सीख लिया है। बिना पूरी सच्चाई जाने किसी को दोषी ठहरा देना आसान हो गया है। ऐसे समय में सत्य का मौन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उसे पता है कि क्षणिक शोर से अधिक प्रभावशाली समय का निर्णय होता है।
जीवन हमें यही सिखाता है कि हर बात का उत्तर शब्दों से नहीं दिया जाता। कुछ उत्तर हमारे कर्म देते हैं, कुछ हमारा चरित्र और कुछ का निर्णय समय करता है। इसलिए जब आपका मन सच के साथ हो, तो हर आरोप का जवाब देने की जल्दबाज़ी न करें। धैर्य रखें, क्योंकि समय से बड़ा न्यायाधीश कोई नहीं।
याद रखिए झूठ को अपनी रक्षा के लिए शब्दों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन सत्य को केवल समय का साथ चाहिए।
कुछ बातों का उत्तर शब्द नहीं, समय देता है


