डॉ विजय गर्ग
(जीभ से पहले दिमाग को होता है स्वाद का अहसास)
(स्वाद की असली प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क है)
जब आपके सामने गर्मागर्म समोसे की प्लेट आती है, ताज़ी जलेबी की मिठास हवा में घुलती है या किसी रेस्तरां से आती पिज़्ज़ा की सुगंध आपके नथुनों तक पहुँचती है, तो क्या आपने कभी सोचा है कि स्वाद का अनुभव वास्तव में कहाँ शुरू होता है? अधिकांश लोग मानते हैं कि स्वाद का संबंध केवल जीभ से है, लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस और खाद्य विज्ञान एक अलग कहानी बताते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, भोजन का स्वाद जीभ पर पहुँचने से पहले ही हमारे दिमाग में बनना शुरू हो जाता है।
दरअसल, स्वाद केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क, स्मृतियों, भावनाओं, गंध, दृष्टि और अनुभवों का संयुक्त परिणाम है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि हम भोजन को पहले दिमाग से चखते हैं और बाद में जीभ से।
स्वाद की पारंपरिक समझ और नई वैज्ञानिक सोच
सदियों तक यह माना जाता रहा कि जीभ ही स्वाद की मुख्य और लगभग एकमात्र पहचानकर्ता है। जीभ पर मौजूद स्वाद कलिकाएँ भोजन में मौजूद रासायनिक तत्वों को पहचानती हैं और उन्हें तंत्रिका संकेतों के रूप में मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं।
जीभ पाँच प्रमुख स्वादों को पहचान सकती है—
– मीठा
– नमकीन
– खट्टा
– कड़वा
– उमामी
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ये स्वाद केवल संकेत हैं। उनका अर्थ निकालना, उन्हें सुखद या अप्रिय मानना और उनके आधार पर प्रतिक्रिया देना मस्तिष्क का काम है।
यदि मस्तिष्क इन संकेतों को ग्रहण न करे, तो स्वाद का पूरा अनुभव समाप्त हो सकता है। अर्थात स्वाद का अंतिम निर्णय जीभ नहीं, दिमाग करता है।
भोजन को पहले आँखें चखती हैं
कभी गौर किया है कि सुंदर ढंग से सजाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट लगता है? इसका कारण केवल उसकी गुणवत्ता नहीं बल्कि हमारी दृश्य प्रणाली है।
जब हम किसी भोजन को देखते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसके रंग, आकार, बनावट और प्रस्तुति के आधार पर पहले ही अनुमान लगा लेता है कि उसका स्वाद कैसा होगा। यही कारण है कि सुनहरे रंग की कुरकुरी कचौड़ी या चमकदार मिठाई हमें अधिक आकर्षित करती है।
वैज्ञानिक प्रयोगों में पाया गया है कि यदि एक ही पेय को अलग-अलग रंगों में प्रस्तुत किया जाए, तो लोग उसके स्वाद को अलग-अलग बताते हैं। लाल रंग का पेय अधिक मीठा महसूस होता है जबकि हरे रंग का पेय अपेक्षाकृत खट्टा प्रतीत हो सकता है।
इस प्रकार स्वाद का पहला अध्याय आँखों से शुरू होता है।
गंध: स्वाद की सबसे शक्तिशाली साथी
यदि किसी व्यक्ति की नाक बंद हो जाए, तो अधिकांश भोजन बेस्वाद लगने लगता है। इसका कारण यह है कि हम जो स्वाद महसूस करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा वास्तव में गंध से आता है।
जब भोजन चबाया जाता है, तो उससे निकलने वाले सुगंधित अणु नाक तक पहुँचते हैं। वहाँ मौजूद रिसेप्टर्स उन्हें पहचानकर मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं। मस्तिष्क इन संकेतों को जीभ से प्राप्त स्वाद संकेतों के साथ जोड़कर एक संपूर्ण “फ्लेवर” तैयार करता है।
यही कारण है कि चाय, कॉफी, आम, इलायची, पुदीना या ताज़े मसालों की सुगंध हमें भोजन का आनंद कई गुना बढ़ा देती है।
कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों लोगों ने स्वाद और गंध खोने का अनुभव किया। उस समय वैज्ञानिकों और आम लोगों को स्पष्ट रूप से समझ आया कि स्वाद वास्तव में केवल जीभ का नहीं, बल्कि गंध और मस्तिष्क का भी खेल है।
स्मृतियाँ भी बदल देती हैं स्वाद
क्या आपने कभी महसूस किया है कि बचपन में खाई गई दादी की बनाई खीर आज भी किसी पाँच सितारा होटल की मिठाई से अधिक स्वादिष्ट लगती है?
इसका कारण केवल उसकी सामग्री नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनात्मक स्मृतियाँ हैं।
हमारा मस्तिष्क भोजन को अनुभवों और भावनाओं के साथ जोड़ता है। जब कोई भोजन हमें किसी सुखद स्मृति की याद दिलाता है, तो उसका स्वाद अधिक अच्छा महसूस होता है।
इसी प्रकार किसी बीमारी के दौरान खाया गया भोजन बाद में कम पसंद आ सकता है क्योंकि मस्तिष्क उसे नकारात्मक अनुभव से जोड़ लेता है।
स्वाद इसलिए केवल भोजन में नहीं, हमारी यादों में भी बसता है।
भावनाएँ और मनोदशा भी तय करती हैं स्वाद
मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हमारी मानसिक स्थिति भोजन के स्वाद को प्रभावित करती है।
जब व्यक्ति प्रसन्न होता है, तो सामान्य भोजन भी अधिक स्वादिष्ट लगता है। इसके विपरीत तनाव, चिंता, अवसाद या क्रोध की स्थिति में पसंदीदा भोजन भी आकर्षक नहीं लगता।
यही कारण है कि कुछ लोग तनाव के समय अधिक मीठा खाते हैं, जबकि कुछ लोगों की भूख ही समाप्त हो जाती है।
दिमाग भोजन को केवल रासायनिक पदार्थों के रूप में नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव के रूप में भी ग्रहण करता है।
स्वाद और मस्तिष्क का वैज्ञानिक तंत्र
जब भोजन जीभ पर पहुँचता है, तो स्वाद कलिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं। ये कलिकाएँ तंत्रिकाओं के माध्यम से संकेतों को मस्तिष्क के विभिन्न भागों तक भेजती हैं।
मस्तिष्क का एक विशेष क्षेत्र, जिसे गस्टेटरी कॉर्टेक्स कहा जाता है, स्वाद संबंधी जानकारी को संसाधित करता है। इसके साथ ही अन्य क्षेत्र गंध, तापमान, बनावट, स्मृति और भावनाओं की जानकारी जोड़ते हैं।
इन सभी सूचनाओं को मिलाकर मस्तिष्क एक अंतिम अनुभव तैयार करता है, जिसे हम “स्वाद” कहते हैं।
इस दृष्टि से स्वाद वास्तव में एक मानसिक निर्माण है।
क्यों पसंद आते हैं कुछ स्वाद?
मानव विकास के दौरान मस्तिष्क ने कुछ स्वादों के प्रति विशेष प्रतिक्रियाएँ विकसित की हैं।
मीठा स्वाद ऊर्जा का संकेत देता था, इसलिए मनुष्य स्वाभाविक रूप से उसे पसंद करता है।
कड़वा स्वाद कई बार विषैले पदार्थों से जुड़ा होता था, इसलिए उसके प्रति सावधानी विकसित हुई।
नमकीन स्वाद शरीर के लिए आवश्यक खनिजों का संकेत देता था।
खट्टा स्वाद भोजन की ताजगी या खराब होने की स्थिति का संकेत दे सकता था।
इस प्रकार स्वाद की हमारी पसंद केवल संस्कृति नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के विकास का परिणाम भी है।
भोजन उद्योग कैसे प्रभावित करता है हमारे दिमाग को?
्
आधुनिक खाद्य उद्योग इस तथ्य को भली-भाँति समझता है कि स्वाद दिमाग में पैदा होता है।
इसी कारण कंपनियाँ आकर्षक पैकेजिंग, रंग, विज्ञापन, संगीत और सुगंध का उपयोग करती हैं। सुपरमार्केट में ताज़ी ब्रेड की खुशबू, फास्ट फूड के चमकदार विज्ञापन और सुंदर पैकेजिंग हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।
अक्सर हम उत्पाद का वास्तविक स्वाद लेने से पहले ही उसके बारे में सकारात्मक धारणा बना लेते हैं।
क्या भविष्य में दिमाग से नियंत्रित होगा स्वाद?
वैज्ञानिक ऐसे उपकरणों और तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो बिना वास्तविक भोजन के भी स्वाद का अनुभव उत्पन्न कर सकें। वर्चुअल रियलिटी और न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं जिनमें विद्युत संकेतों के माध्यम से मस्तिष्क को स्वाद का अनुभव कराया जा सकता है।
यदि ये तकनीकें सफल होती हैं, तो भविष्य में लोग कम कैलोरी वाले भोजन को भी अधिक स्वादिष्ट महसूस कर सकते हैं या विशेष चिकित्सा स्थितियों में स्वाद की कमी को दूर किया जा सकेगा।
स्वाद का अनुभव हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और अद्भुत है। जीभ स्वाद की शुरुआत अवश्य करती है, लेकिन उसकी व्याख्या, उसका आनंद और उससे जुड़ी भावनाएँ मस्तिष्क में जन्म लेती हैं। भोजन का रंग, गंध, स्मृतियाँ, भावनाएँ और वातावरण—सारे मिलकर स्वाद का निर्माण करते हैं।
अगली बार जब आप अपने पसंदीदा भोजन का आनंद लें, तो याद रखिए कि वह केवल आपकी जीभ को नहीं, बल्कि आपके पूरे मस्तिष्क को संतुष्ट कर रहा है। सच तो यह है कि स्वाद का पहला निवाला जीभ नहीं, दिमाग लेता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


