*- डॉ विजय गर्ग*
आज का दौर तकनीक और आधुनिकता का दौर है। मनोरंजन के साधन हमारे इतने करीब आ चुके हैं कि अब एक क्लिक पर दुनिया भर का सिनेमा हमारी मुट्ठी में है। मल्टीप्लेक्स की चमचमाती दुनिया, मखमली सीटें, डॉल्बी साउंड सिस्टम और अब तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने सिनेमा को सीधे हमारे बेडरूम या मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचा दिया है। सचमुच, ‘सिनेमा’ हमारे घर तो आ गया है, लेकिन इस चमक-दमक के बीच सिनेमा से जुड़ा वह पुराना ‘उत्सव’ कहीं पीछे छूट गया है।
### जब सिनेमा एक त्योहार था
एक दौर था जब सिनेमा देखना सिर्फ एक फिल्म देखना नहीं होता था, बल्कि वह पूरे परिवार, गली-मोहल्ले या दोस्तों के लिए किसी बड़े त्योहार या उत्सव से कम नहीं था।
* *साझा उत्साह:* फिल्म देखने की योजना हफ़्तों पहले बनती थी। रविवार के दिन पूरा परिवार सज-धज कर ऐसे निकलता था, मानो किसी शादी-ब्याह में जा रहा हो।
* *टिकट की कतार और रोमांच:* सिंगल स्क्रीन थिएटरों के बाहर टिकट खिड़की पर लगने वाली लंबी कतारें, ब्लैक में टिकट मिलने का रोमांच और हाउसफुल का बोर्ड देखकर लगने वाला वो मीठा सा झटका—यह सब उस उत्सव का हिस्सा थे।
* *सामूहिकता का आनंद:* हॉल के भीतर का माहौल जीवंत होता था। हीरो की एंट्री पर तालियाँ और सीटियाँ बजना, विलेन की धुनाई पर पूरा हॉल गूंज उठना और किसी भावुक दृश्य पर सामूहिक रूप से सिसकियाँ लेना। वहाँ बैठा हर अजनबी उस वक्त एक बड़े परिवार का हिस्सा बन जाता था।
### घर आया सिनेमा, सिमट गया दायरा
आज मल्टीप्लेक्स और ओटीटी के आने से सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन सिनेमा का वह सामाजिक और सामूहिक चरित्र कहीं खो गया है।
* *एकांत का मनोरंजन:* अब हम अपनी-अपनी स्क्रीन पर, अपने-अपने कमरों में, ईयरफोन लगाकर फिल्में देखते हैं। मनोरंजन जो कभी ‘सबका’ था, अब सिर्फ ‘मेरा’ होकर रह गया है। हम भीड़ में होकर भी अकेले हैं।
* *महँगाई की मार:* आज मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखना हर वर्ग के बस की बात नहीं रही। टिकटों के आसमान छूते दाम और महंगे पॉपकॉर्न ने सिनेमा को एक खास वर्ग के स्टेटस सिंबल में बदल दिया है। जो सिनेमा कभी आम आदमी के सुख-दुख का साथी था, वह अब जेब पर भारी पड़ने लगा है।
सिनेमा हॉल के बाहर लगी लंबी कतारें, पोस्टरों के सामने खड़े लोग, और सबसे बड़ा रोमांच- टिकट की खिड़की! वह टिकट खिड़की भी कोई खिड़की नहीं थी। मुश्किल से चार-चार इंच का एक सुराख। उस छोटे से सुराख में न जाने कितने सपने, कितनी उम्मीदें और कितने हाथ एक साथ घुस जाते थे। हर हाथ में पांच-दस के मुड़े-तुड़े नोट और एक ही पुकार—
भाई, दो टिकट इधर!, बॉक्स की पांच देना!, चार बालकनी दे दो! एक टिकट बची है क्या? जिसे टिकट मिल जाती फिर वह सीट मिलते ही रूमाल रख देता था जैसे खेत में खूंटा गाड़ दिया हो। उस खिड़की तक पहुंचना एवरेस्ट फतह करने जैसा था। लाइन में लगकर भी टिकट मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं होती थी। कई बार घंटों खड़े रहने के बाद जवाब मिलता- हाउसफुल!
उन दिनों घर में यदि कोई बटेऊ आ जाए या कोई खास मेहमान आ जाए तो उसकी खातिरदारी का सबसे शानदार तरीका था कि उसे फिल्म दिखाने ले जाओ। अब फिल्म देखने से पहले दिल नहीं धड़कता कि टिकट मिलेगी या नहीं। अब इंटरवल में पूरा हॉल एक साथ नहीं हंसता। अब किसी हीरो की एंट्री पर किलकी, सीटियां और तालियां कम सुनाई देती हैं।
इंटरवल भी किसी मेले से कम नहीं होता था। समोसे, कोल्ड ड्रिंक, मूंगफली और दोस्तों के साथ चुहलबाजियां। पहले पंखा चलता था तो पूरा हॉल खुशी-खुशी फिल्म देखता और आज ए.सी. दो मिनट बंद हो जाये तो लोग यूं बाहर निकलते हैं जैसे फिल्म नहीं भट्ठी में बैठे हों।
* *अति उपलब्धता और ठहराव की कमी:* पहले साल में कुछ चुनिंदा फिल्में आती थीं, जिनका बेसब्री से इंतजार होता था। आज हर हफ्ते दर्जनों फिल्में और वेब सीरीज रिलीज हो रही हैं। कंटेंट की इस बाढ़ ने हमारे भीतर के उस ‘चाव’ और ‘इंतजार के सस्पेंस’ को खत्म कर दिया है। अब हम फिल्में ‘देखते’ नहीं, बस ‘कंज्यूम’ करते हैं।
देखा जाए तो आधुनिकता की इस ‘तिरछी नज़र’ ने हमसे हमारी सादगी और खुशियाँ साझा करने का हुनर छीन लिया है। हमने तकनीक के नाम पर सुविधाएं तो खूब बटोरीं, लेकिन उन सुविधाओं के बदले अपनी रूहानी खुशियाँ दांव पर लगा दीं।
सिनेमा का घर तक आना विकास की निशानी हो सकता है, लेकिन उस सामूहिक उल्लास, ताली-सीटी के शोर और अजनबियों के साथ मिलकर हंसने-रोने वाले ‘उत्सव’ का पीछे छूट जाना एक सांस्कृतिक नुकसान है। ज़रूरत इस बात की है कि हम तकनीक का आनंद लें, लेकिन अपनों के साथ बैठकर खुशियाँ साझा करने के उस पुराने, अनमोल ‘उत्सव’ को पूरी तरह से मरने न दें।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


