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Friday, June 12, 2026

बढ़ता विज्ञान, घटती रूढ़िवादिता: बदलते भारत की नई तस्वीर

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प्रो. राजकुमार
मानव सभ्यता का इतिहास ज्ञान, खोज और परिवर्तन का इतिहास है। जब-जब विज्ञान ने प्रगति की है, तब-तब समाज ने अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और संकीर्ण सोच की जंजीरों को तोड़ने का प्रयास किया है। आज का भारत भी इसी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जहां विज्ञान का विस्तार लोगों की सोच को नया आयाम दे रहा है और सदियों पुरानी कई रूढ़ियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं।

एक समय था जब प्राकृतिक घटनाओं को दैवीय चमत्कार या प्रकोप माना जाता था। ग्रहण को अपशकुन समझा जाता था, बीमारियों को दुष्ट शक्तियों का प्रभाव माना जाता था और कई सामाजिक बुराइयों को परंपरा का नाम देकर स्वीकार कर लिया जाता था। लेकिन विज्ञान ने इन धारणाओं को चुनौती दी। वैज्ञानिक शोधों और शिक्षा के प्रसार ने लोगों को तर्क और प्रमाण के आधार पर सोचने की प्रेरणा दी।

आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई ), अंतरिक्ष अनुसंधान और चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। गांवों से लेकर महानगरों तक लोग जानकारी के लिए अब अफवाहों पर नहीं, बल्कि तथ्यों पर भरोसा करने लगे हैं। पहले जहां किसी बीमारी के इलाज के लिए झाड़-फूंक का सहारा लिया जाता था, वहीं अब लोग अस्पतालों और वैज्ञानिक उपचार पद्धतियों की ओर बढ़ रहे हैं।

विज्ञान का सबसे बड़ा प्रभाव सामाजिक सोच पर पड़ा है। शिक्षा के प्रसार ने जाति, लिंग और जन्म आधारित भेदभाव पर सवाल खड़े किए हैं। महिलाएं आज अंतरिक्ष से लेकर सेना और विज्ञान प्रयोगशालाओं तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। युवाओं की नई पीढ़ी परंपराओं का सम्मान तो करती है, लेकिन उन्हें आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय तर्क की कसौटी पर परखना भी सीख रही है।

हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि रूढ़िवादिता पूरी तरह समाप्त हो गई है। आज भी समाज के कुछ हिस्सों में अंधविश्वास, सामाजिक भेदभाव और अवैज्ञानिक मान्यताएं मौजूद हैं। सोशल मीडिया के दौर में कई बार अफवाहें और मिथक भी तेजी से फैलते हैं। इसलिए विज्ञान का विस्तार केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी बढ़ावा देना आवश्यक है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 51(क) में प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बताया गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना को विकसित करे। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि आधुनिक राष्ट्र निर्माण का आधार है। जब समाज तर्क, प्रमाण और ज्ञान को महत्व देता है, तभी वह प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

विज्ञान और परंपरा को एक-दूसरे का विरोधी मानना भी उचित नहीं है। स्वस्थ परंपराएं समाज को सांस्कृतिक पहचान देती हैं, जबकि विज्ञान उन्हें समयानुकूल और उपयोगी बनाए रखने का माध्यम बनता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं को विवेक के साथ अपनाएं और उन रूढ़ियों को छोड़ दें जो मानव विकास और समानता के मार्ग में बाधा बनती हैं।

आज का भारत चंद्रमा और मंगल तक पहुंच रहा है, डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है। ऐसे समय में वैज्ञानिक सोच को जन-जन तक पहुंचाना केवल विकास की जरूरत नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की भी अनिवार्यता है।
बढ़ता विज्ञान केवल नई मशीनें और तकनीक नहीं देता, बल्कि सोचने का नया तरीका भी देता है। यही कारण है कि जहां विज्ञान का प्रकाश फैलता है, वहां रूढ़िवादिता का अंधेरा स्वतः कम होने लगता है। आधुनिक भारत की असली ताकत भी इसी संतुलन में है—ज्ञान का विस्तार, तर्क का सम्मान और मानवता का उत्थान।
लेखक देश के जाने माने न्यूरोसर्जन और रिम्स झारखण्ड के निदेशक हैं

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