प्रशांत कटियार
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट होता है, लेकिन भारत की राजनीति में आज वही वोट सबसे सस्ता और सबसे अधिक ठगा जाने वाला अधिकार बनता जा रहा है। चुनाव के समय नेता जनता के बीच हाथ जोड़कर जाते हैं, अपनी पार्टी की विचारधारा का गुणगान करते हैं, विरोधियों को देश और समाज का दुश्मन बताते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं और जनता से समर्थन मांगते हैं। लेकिन सत्ता की कुर्सी दिखते ही वही नेता अपनी जुबान, विचारधारा और सिद्धांतों को ऐसे बदल लेते हैं जैसे कपड़े बदले जाते हों।
आज दल बदल कोई राजनीतिक घटना नहीं रह गई, बल्कि यह जनता के जनादेश की खुली लूट बन चुका है। जनता जिस पार्टी के नाम पर वोट देती है, चुनाव जीतने के बाद नेता उसी जनादेश को अपने निजी फायदे के लिए बेच देता है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि यह सब कानून की आड़ में होता है और लोकतंत्र तमाशबीन बनकर देखता रहता है।
दल बदल विरोधी कानून बनाया गया था ताकि जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ न हो सके, लेकिन राजनीति ने उसका भी रास्ता निकाल लिया। अब नेता अकेले नहीं, झुंड में पार्टी बदलते हैं। दर्जनों विधायक या सांसद एक साथ पाला बदलते हैं और कानूनी तकनीकीताओं का फायदा उठाकर अपनी कुर्सी भी बचा लेते हैं। कानून बच जाता है, लेकिन लोकतंत्र हार जाता है।
सवाल सीधा है क्या जनता ने किसी नेता को चुनाव जीतने के बाद अपनी विचारधारा बेचने का अधिकार दिया था, क्या जनता ने उसे इसलिए चुना था कि वह सत्ता के गलियारों में अपनी बोली लगवा सके,यदि नहीं, तो फिर दल बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों की सदस्यता एक मिनट भी क्यों बनी रहनी चाहिए,विडंबना यह है कि चुनाव के दौरान जिस पार्टी को नेता भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और जनविरोधी राजनीति का प्रतीक बताते हैं, कुछ ही महीनों बाद उसी पार्टी के मंच पर खड़े होकर उसकी जय जयकार करने लगते हैं।
इससे बड़ा राजनीतिक पाखंड और नैतिक दिवालियापन शायद ही कोई दूसरा हो। दल-बदल को राजनीतिक चतुराई नहीं, लोकतांत्रिक अपराध माना जाए। चाहे एक नेता पार्टी बदले या सौ नेता मिलकर, सभी की सदस्यता तत्काल समाप्त होनी चाहिए। इतना ही नहीं, ऐसे नेताओं पर लंबे समय तक चुनाव लड़ने और किसी राजनीतिक पद पर रहने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, ताकि जनता का विश्वास बेचने वालों को स्पष्ट संदेश मिल सके।जनता का वोट कोई शेयर बाजार का सौदा नहीं है, जिसे सत्ता की कीमत देखकर खरीदा और बेचा जाए।
जो नेता जनादेश का व्यापार करते हैं, वे केवल पार्टी नहीं बदलते, वे जनता के भरोसे की हत्या करते हैं। जिस दिन जनता इस छल को पहचानकर ऐसे अवसरवादी नेताओं को राजनीति से बाहर का रास्ता दिखा देगी, उसी दिन लोकतंत्र सच मायनों में मजबूत होगा।जनादेश जनता का होता है, नेताओं की निजी संपत्ति नहीं। जब तक यह बात राजनीति को समझ नहीं आएगी, तब तक दल बदल लोकतंत्र के माथे पर कलंक बनकर चिपका रहेगा।


