सुल्तानपुर।उत्तर प्रदेश में जब भी कानून-व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो प्रशासन का सबसे आसान और लोकप्रिय उपाय होता है तबादला। यह मान लिया जाता है कि यदि थाना प्रभारी बदल दिया जाए, चौकी इंचार्ज हटा दिया जाए या कुछ पुलिसकर्मियों को इधर से उधर कर दिया जाए तो व्यवस्था स्वतः सुधर जाएगी। लेकिन सुलतानपुर का ताजा अनुभव इस सोच पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
जिले में पुलिस अधीक्षक चारू निगम के कार्यकाल के दौरान मात्र 121 दिनों में 400 से अधिक तबादले, पोस्टिंग और विभागीय कार्रवाइयां हुईं। यह संख्या अपने आप में एक रिकॉर्ड है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन तबादलों से कानून-व्यवस्था में कोई उल्लेखनीय सुधार आया? यदि जवाब “नहीं” है तो फिर समस्या व्यक्तियों में नहीं, व्यवस्था में तलाशनी होगी।
वास्तविकता यह है कि जिले में हत्या, चोरी, लूट और महिला अपराधों की घटनाएं लगातार चर्चा में बनी हुई हैं। कई थानों की कार्यप्रणाली को लेकर जनता में असंतोष है। शिकायतें हैं कि एफआईआर दर्ज करने से लेकर विवेचना तक की प्रक्रिया प्रभावित है। ऐसे में 400 तबादलों के बाद भी यदि हालात नहीं बदले तो यह स्वीकार करना होगा कि पुलिसिंग केवल कुर्सियां बदलने से नहीं सुधरती।
दरअसल, तबादले प्रशासनिक प्रबंधन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होते। एक थाना प्रभारी को हटाकर दूसरे को बैठा देना आसान है, लेकिन क्या इससे थाने की कार्यसंस्कृति बदल जाती है? क्या इससे राजनीतिक दबाव समाप्त हो जाता है? क्या इससे संसाधनों की कमी दूर हो जाती है? क्या इससे भ्रष्टाचार और जवाबदेही की समस्या खत्म हो जाती है? जवाब स्पष्ट है—नहीं।
बार-बार होने वाले तबादलों का एक नकारात्मक पक्ष भी होता है। जब किसी अधिकारी को यह भरोसा नहीं होता कि वह किसी स्थान पर कुछ महीनों से अधिक टिक पाएगा, तो उसका ध्यान दीर्घकालिक सुधारों के बजाय केवल तत्काल व्यवस्थाओं पर केंद्रित हो जाता है। इससे जवाबदेही कमजोर होती है। अधिकारी यह सोचने लगता है कि यदि कुछ गलत हुआ तो अगला तबादला ही समाधान बन जाएगा।


