शरद कटियार
भारत का सामाजिक इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही जटिल भी है। यहां हजारों वर्षों से विभिन्न जातियां, समुदाय, भाषाएं और परंपराएं साथ-साथ विकसित होती रही हैं। लेकिन यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि सामाजिक संरचना के भीतर असमानता और वंचना के अनेक रूप मौजूद रहे। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय, समान अवसर और प्रतिनिधित्व का प्रश्न हमेशा राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहा है। आज जब जातिगत जनगणना, आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे चर्चा में हैं, तब यह समझना आवश्यक है कि इनका उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही असमानताओं को पहचानकर उन्हें दूर करना है।
जातिगत जनगणना को लेकर देश में विभिन्न मत हैं, लेकिन इसका मूल उद्देश्य किसी जाति विशेष को श्रेष्ठ या कमजोर सिद्ध करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य यह जानना है कि देश के विभिन्न सामाजिक वर्गों की वास्तविक जनसंख्या कितनी है, उनकी आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति क्या है तथा विकास की योजनाओं का लाभ किन वर्गों तक पहुंच रहा है और कौन अभी भी पीछे छूटा हुआ है। बिना सटीक आंकड़ों के किसी भी सरकार के लिए प्रभावी सामाजिक नीति बनाना कठिन होता है। इसलिए जातिगत जनगणना को कई लोग सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपकरण मानते हैं।
भारतीय समाज में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसूचित जाति (एससी) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। कृषि, शिल्प, श्रम, निर्माण, लोक संस्कृति, सैन्य सेवा और आर्थिक गतिविधियों के अनेक क्षेत्रों में इन वर्गों ने राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश की बड़ी आबादी इन्हीं वर्गों से आती है। बावजूद इसके, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक इन समुदायों को शिक्षा, प्रशासन और सत्ता संरचनाओं में पर्याप्त अवसर नहीं मिल सके। यही वह पृष्ठभूमि थी जिसने सामाजिक न्याय की नीतियों की आवश्यकता को जन्म दिया।
ब्रिटिश शासन ने भारत की सामाजिक संरचना को समझने के साथ-साथ उसका राजनीतिक उपयोग भी किया। अंग्रेजों की प्रसिद्ध “फूट डालो और राज करो” नीति ने विभिन्न समुदायों और जातियों के बीच विभाजन को कई बार और गहरा किया। 1871 से शुरू हुई औपनिवेशिक जनगणनाओं में भारतीय समाज को विभिन्न जातीय वर्गों में विभाजित कर दर्ज किया गया। इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि इस प्रक्रिया ने जातीय पहचान को प्रशासनिक और राजनीतिक पहचान में भी बदल दिया। अंग्रेजों के लिए यह शासन को आसान बनाने का माध्यम था, लेकिन इसके दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव स्वतंत्र भारत तक दिखाई देते रहे।
स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को राष्ट्र निर्माण का एक महत्वपूर्ण आधार बनाया। संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, ताकि सदियों से वंचित वर्गों को शिक्षा और सरकारी सेवाओं में अवसर मिल सकें। लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के प्रश्न पर लंबे समय तक व्यापक बहस चलती रही।
इसी संदर्भ में 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना तथा उनके उत्थान के लिए सुझाव देना था। मंडल आयोग ने विस्तृत अध्ययन के बाद पाया कि देश की बड़ी आबादी सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ी हुई है तथा उसे विशेष अवसरों की आवश्यकता है।
मंडल आयोग की सिफारिशें वर्षों तक राजनीतिक बहस का विषय बनी रहीं। अंततः 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की। यह भारतीय राजनीति और सामाजिक न्याय के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। इस निर्णय ने लाखों युवाओं को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर प्रदान किए। हालांकि उस समय देश के कई हिस्सों में समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिले, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गई।
आज जब जातिगत जनगणना की मांग उठती है, तो उसके पीछे एक बड़ा तर्क यही है कि सामाजिक न्याय की नीतियों को अद्यतन और तथ्य आधारित बनाया जाए। यदि सरकारों को यह पता ही न हो कि कौन-सा वर्ग किस स्थिति में है, तो योजनाओं और संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण कठिन हो जाता है। इसलिए समर्थक इसे आंकड़ों के माध्यम से सामाजिक वास्तविकता को समझने का प्रयास मानते हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी आवश्यक है। जातिगत जनगणना का उद्देश्य समाज को स्थायी रूप से जातियों में बांटना नहीं होना चाहिए। आंकड़े सामाजिक न्याय के साधन बनें, सामाजिक संघर्ष का आधार नहीं। यदि जनगणना से प्राप्त जानकारी का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए किया जाए, तो यह राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का अगला चरण केवल जातीय पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता। सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता दोनों को साथ लेकर चलना होगा। ओबीसी, एससी, एसटी, सामान्य वर्ग, अल्पसंख्यक और सभी समुदाय भारत की सामूहिक शक्ति हैं। किसी भी वर्ग का उत्थान राष्ट्र की सामूहिक प्रगति का हिस्सा है, न कि किसी दूसरे वर्ग की हार।
आज आवश्यकता “जाति बनाम राष्ट्र” की नहीं, बल्कि “जाति से जमात और जमात से राष्ट्र” की सोच की है। जाति हमें हमारी सामाजिक पृष्ठभूमि बताती है, लेकिन जमात हमें साझा उद्देश्यों से जोड़ती है। जब किसान अपनी समस्याओं के समाधान के लिए एकजुट होता है, जब युवा रोजगार के लिए आवाज उठाते हैं, जब समाज भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है, तब वहां जातियां नहीं बल्कि एक उद्देश्य आधारित जमात खड़ी होती है।
भारत का भविष्य तभी मजबूत होगा जब सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें। जातिगत जनगणना, आरक्षण और प्रतिनिधित्व जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य भी अंततः यही होना चाहिए कि समाज का कोई वर्ग पीछे न रह जाए और सभी नागरिक समान अवसरों के साथ राष्ट्र निर्माण में भागीदारी कर सकें।
यही वह रास्ता है जो डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक न्याय के स्वप्न, मंडल आयोग की सिफारिशों की भावना और वी.पी. सिंह के ऐतिहासिक निर्णय को व्यापक राष्ट्रीय एकता से जोड़ता है। भारत की अगली छलांग तभी संभव है जब सामाजिक न्याय की यात्रा जातीय टकराव में नहीं, बल्कि सामाजिक साझेदारी और राष्ट्रीय समरसता में परिवर्तित हो। यही “जाति से जमात की ओर” बढ़ते भारत का वास्तविक अर्थ है।


