– सत्ता तक पहुंचने का सबसे बड़ा हथियार बने दलित और पिछड़े
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले तीन दशकों का सबसे बड़ा सच यदि किसी एक शब्द में समेटा जाए तो वह है “जाति”। कभी सामाजिक न्याय के नाम पर तो कभी बहुजन राजनीति के नाम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वाले दलों ने प्रदेश की राजनीति को इस कदर जातीय समीकरणों में बांट दिया कि विकास, शिक्षा, रोजगार और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे अक्सर पीछे छूटते चले गए। आंकड़े बताते हैं कि दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले अधिकांश दलों में सत्ता और संगठन का केंद्र अंततः सीमित जातीय दायरों तक सिमट गया।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने खुद को पिछड़ों, किसानों और समाज के वंचित वर्गों की पार्टी के रूप में स्थापित किया। मंडल राजनीति के बाद सपा तेजी से उभरी और यादव-मुस्लिम समीकरण उसकी सबसे बड़ी ताकत बना। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप रहा कि सत्ता में आने के बाद संगठन और सरकार के बड़े पदों पर सबसे ज्यादा प्रभाव सैफई परिवार और सजातीय नेताओं का दिखाई दिया।
राजनीतिक आंकड़ों पर नजर डालें तो मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव सरकार तक संगठन और सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर यादव समुदाय की मजबूत पकड़ रही। 2012 में बनी अखिलेश सरकार में कई बड़े विभाग यादव नेताओं के पास रहे। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि सपा सामाजिक न्याय की बात तो करती है, लेकिन राजनीतिक ताकत सीमित जातीय दायरे में केंद्रित रहती है।
बहुजन समाज पार्टी की राजनीति भी सामाजिक परिवर्तन और दलित उत्थान के बड़े नारों के साथ खड़ी हुई थी। कांशीराम ने “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का नारा देकर बहुजन राजनीति को नई दिशा दी। लेकिन समय के साथ बसपा पर भी यह आरोप लगने लगे कि पार्टी का नेतृत्व और भरोसेमंद चेहरा मुख्य रूप से जाटव-चमार समाज तक सीमित होता चला गया।
आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21 प्रतिशत है, जिसमें जाटव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 10-11 प्रतिशत मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बसपा का सबसे मजबूत कोर वोट बैंक भी यही वर्ग रहा। यही कारण रहा कि बसपा पर अन्य दलित जातियों की उपेक्षा के आरोप समय-समय पर लगते रहे।
अब भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख को लेकर भी यही चर्चायें तेज हैं । चंद्रशेखर आजाद दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय की राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में उभरे, लेकिन राजनीतिक विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि उनकी राजनीति भी धीरे-धीरे एक सीमित जातीय आधार पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है। हालांकि उनके समर्थक इसे दलित प्रतिनिधित्व की मजबूरी बताते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति अब केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं रह गई, बल्कि सत्ता हासिल करने का सबसे बड़ा गणित बन चुकी है। प्रदेश की करीब 54 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्गों की मानी जाती है, जबकि अनुसूचित जातियों की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है। यही कारण है कि लगभग हर राजनीतिक दल चुनाव से पहले सामाजिक न्याय, भागीदारी और सम्मान की बात करता है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जाति आधारित राजनीति ने वास्तव में दलितों और पिछड़ों की स्थिति बदली या केवल कुछ राजनीतिक परिवारों और सीमित जातीय समूहों को सत्ता तक पहुंचाया? उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीब तबकों की हालत आज भी बड़े सवाल बने हुए हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सामाजिक न्याय की राजनीति तब तक अधूरी मानी जाएगी, जब तक उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक न पहुंचे। फिलहाल प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण अभी भी सबसे बड़ा चुनावी हथियार बने हुए हैं और सत्ता की हर लड़ाई इन्हीं सामाजिक गणितों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।


