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Thursday, May 28, 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति और युवा: नारे से नेतृत्व तक का अधूरा सफर: प्रो. एच. एन. शर्मा

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प्रो. एच. एन. शर्मा

उत्तर प्रदेश केवल भारत का सबसे बड़ा राज्य नहीं बल्कि देश की राजनीति की धुरी माना जाता है। दिल्ली की सत्ता का रास्ता भी अक्सर लखनऊ होकर गुजरता है। लेकिन इतने बड़े राजनीतिक प्रभाव वाले प्रदेश में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यहां का युवा राजनीति में भागीदार ज्यादा है या केवल वोट बैंक बनकर रह गया है?

प्रदेश की आबादी में 18 से 35 वर्ष तक के युवाओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है। हर चुनाव में राजनीतिक दल युवाओं के नाम पर बड़े-बड़े वादे करते हैं। कोई नौकरी का सपना दिखाता है, कोई लैपटॉप और टैबलेट बांटता है, तो कोई सामाजिक न्याय और आरक्षण के नाम पर युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही युवा फिर बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था और राजनीतिक उपेक्षा के बीच संघर्ष करता दिखाई देता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवाओं का इस्तेमाल सबसे ज्यादा भीड़ और सोशल मीडिया की ताकत के रूप में हुआ है। राजनीतिक रैलियों की भीड़, पोस्टर लगाने, नारे लगाने और सोशल मीडिया ट्रेंड चलाने तक युवाओं की भूमिका सीमित होती जा रही है। सत्ता और संगठन के बड़े पदों तक पहुंचने का रास्ता आज भी आम युवाओं के लिए आसान नहीं दिखाई देता। अधिकांश दलों में परिवारवाद और जातीय समीकरण अब भी टिकट और पद तय करने का सबसे बड़ा आधार बने हुए हैं।

समाजवादी राजनीति की बात हो या बहुजन आंदोलन की, भाजपा का राष्ट्रवाद हो या कांग्रेस की उदार राजनीति हर दल युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता है। लेकिन जमीन पर युवाओं को निर्णय लेने वाली राजनीति में कितनी हिस्सेदारी मिलती है, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

प्रदेश के लाखों युवा आज भी प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती घोटालों और पेपर लीक जैसी समस्याओं से परेशान हैं। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कई बड़ी परीक्षाएं विवादों में रहीं। भर्ती प्रक्रिया में देरी, रिजल्ट विवाद और तकनीकी गड़बड़ियों ने युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति गुस्सा बढ़ाया है। यही कारण है कि अब युवा केवल जातीय और भावनात्मक नारों से प्रभावित होने के बजाय रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर सवाल पूछने लगा है।

सोशल मीडिया ने भी उत्तर प्रदेश की युवा राजनीति को नया चेहरा दिया है। अब गांव-कस्बों का युवा भी सीधे अपनी बात रख रहा है। वह नेताओं से सवाल पूछ रहा है, स्थानीय मुद्दे उठा रहा है और राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित करने लगा है। यही वजह है कि आज हर राजनीतिक दल डिजिटल प्लेटफॉर्म पर युवाओं को साधने की कोशिश में जुटा हुआ है।

हालांकि यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय ध्रुवीकरण अब भी बेहद मजबूत है। युवा नेता भी अक्सर जातीय समीकरणों के दायरे में सीमित दिखाई देते हैं। सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति कई बार युवाओं को अवसर देने के बजाय उन्हें जातीय खेमों में बांटने का काम करती है। इससे प्रदेश की राजनीति में वैचारिक नेतृत्व कमजोर और पहचान आधारित राजनीति मजबूत होती गई।

लेकिन बदलते समय के साथ एक नई पीढ़ी भी सामने आ रही है, जो राजनीति को केवल जाति और धर्म के चश्मे से नहीं देखना चाहती। यह युवा विकास, रोजगार, तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य और पारदर्शी शासन की बात कर रहा है। वह नेताओं की भाषा नहीं बल्कि काम देखना चाहता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति का भविष्य इसी युवा सोच पर निर्भर करेगा। यदि राजनीतिक दल युवाओं को केवल भीड़ नहीं बल्कि नेतृत्व का अवसर देंगे, तो प्रदेश की राजनीति नई दिशा ले सकती है। लेकिन यदि युवा केवल पोस्टर और नारे तक सीमित रहा, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी धीरे-धीरे निराशा में बदल सकती है।

आज जरूरत केवल युवा वोट की नहीं बल्कि युवा नेतृत्व की है। उत्तर प्रदेश का युवा अब सत्ता के मंच पर अपनी वास्तविक हिस्सेदारी चाहता है, केवल चुनावी भाषणों में अपना नाम सुनना नहीं।

लेखक पूर्व प्रधानमंत्री युवा तुर्क चंद्रशेखर के पूर्व राजनैतिक सलाहकार हैं।

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